भूख

July 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

भूखा गरीब का बच्चा
अपने गरीब पिता से कहा
पापा बहुत भूख लगी है
कहीं से रोटी ला दो
हमारी पेट की आग बुझा दो
पिता ने कहा -बेटा, चारो तरफ
करोना के क़हर है
सारी दुकाने बंद है
घर में अन्न नहीं है
कहाँ से आयेगा तुम्हारे लिए रोटी
रात भी काफी हो चुकी है
अभी सो जा बेटा
कल देखें कौन फरिश्ता आता है

अजनबी साया

July 9, 2021 in ग़ज़ल

सुनसान महल में कोई है जो भटक रही है।
“तूम से है पुराना रिश्ता”
हर बार यही कह रही है।।
कभी करीब से कभी महल के झरोखों से।
क्यों हर रात मुझे जख्म दे रही है।।
न जीने देती है न मरने देती है।
पल पल मुझे बीती पल की एहसास करा रही है।।
कर लुंगा दफ़न खुद को ऐ ‘अमित’।
फिर वही काली रात याद आ रही है।।

मंजिल

July 8, 2021 in ग़ज़ल

फिर एक राही मंजिल से भटक गया।
सभी उम्मीदें पल में ही टूट गया।।
थी जुस्तजू उसे अपना भी कारवाँ होगा।
मुकद्दर के पन्नों पे अपना भी नाम होगा।।
वक्त ने ऐसा पैंतरा बदला ए”अमित”।
कामयाब शख्स भी आज नाकाम हो गया।।
राहें कठिन थी हर मोड़ पे पत्थर था।
नजदीक आई हुई मंजिल आज कोसों दूर हो गया।।

सूखी डाली

July 6, 2021 in मुक्तक

सूखी डाली के पहलू में
चाँद पनाह मांग रहा है।
लाचारी है कि वह क्या करे
वक्त भी अपनी रफ्तार में है

मदहोश शाम

July 3, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ऐ ढलती शाम, ऐ लालिमा बड़ा ताज्जुब है
मिजाज के ऐसा तू कभी रंगीन न था
बला तो सही उनके दीदार के बाद
तू इतना रंग बिरंगी कैसे हो गया।
सूरज तो बेचारा इमान से कभी के ढल गए
हम भला उसे क्या दोष दे, क्या शिकायत करे
जरूर तुझ में ही कहीं न कहीं बेईमानी है
तभी तो आज हद से ज्यादा तू रंगीन हो गया है ।
कहे अमित ऐसे न बिखेर तू अपनी रंगीन शाम
कसम है तुझे इस खुबसुरत नीले गगन की
सिन्हे पे सुंदरता की खंजर फेंकने वाले
बता तो सही तेरी सुंदरता की राज क्या है।

आईना और तदबीर

July 3, 2021 in शेर-ओ-शायरी

ऐ दोस्त दुनिया में प्रेम करने वालों की तकदीर बदलती रहती है।
आईना तो वही रह जाता है मगर तदबीर बदलती रहती है।।

आशियाना

July 2, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आशियाना ढूँढ रही हूँ
इस प्रकृति के संसार में ।
कहीं तो होगा मेरा आशियाना
इस हरे भरे संसार में ।।
बरसात से दोस्ती कर ली
धूप से जोड़ा नया रिश्ता ।
जब ठंड में सकुरा बदन
तब सुर्य बनता है हमारा फरिश्ता।।

मेरे लिए

July 2, 2021 in शेर-ओ-शायरी

कब से उठाए बैठी हूँ अपनी घूंघट
उनके दीदार के लिए ।
एक वो है ख्वाबों में आशियाना तलाशते है मेरे लिए।।

तकदीर और तदबीर

June 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

उधर किसी की हसरतें पुरी हुई
इधर किसी का दिल जला
क्या कहे दोस्त सब की
अपनी अपनी तक़दीर है
अचानक एक दिन उनका ख़त आया
उस में एक ही पंक्ति लिखा था
ए क़ाबिल दिल तकदीर के संग
तदबीर होना भी जरुरी है
मेरा उदास मन फिर
अतीत की लहरों में खो गई।

अश्क और लिबास

June 28, 2021 in शेर-ओ-शायरी

शायद मेरे ज़नाज़े के पीछे
अश्क बहाती हुई कोई आ रही है।
एक झलक देखें तो किस लिबास में
मेरी ज़नाज़े के संग आ रही है।।

अंधेरा

June 28, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

चारो तरफ अंधेरा ही अंधेरा है
लगता है वहाँ किसी का बसेरा है
फिर वही पुरानी दस्तक
आखिर वहाँ कौन खड़ा है
यह राज कहीं राज न रह जाए
ए शख्स आखिर तू कौन है

संग संग

June 28, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जी चाहता है चाँद के संग संग मैं भी
चलूं। मगर सितारे कहते है क्या मैं उदास हो जाउँ।। सदियों से मैं संग संग रहा , वो दीया मैं बाती रहा ।
जब वो चमकता था तब मैं उसका इर्दगिर्द पहरेदार बना रहा ।।
अब तुम ही बताओ मैं कहाँ जाउं
इस बेरहम ज़माने में।

गोधूलि

June 27, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ए ढलती गोधूलि के बेला
मन को मोह लेती है
हमारी ख्यालों में नयी
उर्जा भर देती है
हम इसी उर्जे के सहारे
आने वाले कल के हम
बेसब्र से इन्तजार करते हैं
ए क़ाबिल दिल आज हम
अपने जीवन में यह ढलती
गोधूलि को हसीन गोधूलि बना ले
हमारी जीवन में ऐसा बेला बार बार आए ऐसा हम राह अपना लो।

🌹 (गुलाब)

June 27, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

फेंक कर गुलाब 🌹 मेरे मुंह पे,
मेरी मुहब्बत को गुमान की कसौटी पे तौला न करो ।
माना कि तेरी महफिल में,
मेरी क्या हैसियत है ।
तुम्हें तोहफ़ा देने के लिए
एक गुलाब 🌹 के सिवा
मेरे पास कुछ नहीं है।

चाँदनी की आर में कौन है?

June 24, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आज की रात मेरी इम्तहान की घडी है।
देखना है उस चाँदनी के पीछे कौन खड़ी है।।
पहले तो चाँदनी रात में इतनी रौनक न थी।
जरूर इस चाँदनी की आर में कोई न कोई छिपी है।।
ए क़ाबिल दिल मुझे चाँदनी के उस पार ले चल।
जिस पार चाँदनी रात खुद पे नाज कर रही है।।

दिलजले

June 24, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सोचती हूँ कल तुम क्या थे
आज क्या हो गए हो
पहले तो कहा करते थे
चौदहवीं के चाँद हो तुम
मेरी धड़कन की साज हो तुम
कहाँ गयी तुम्हारी अदा की वो बातें
वो कसमे वो बुलंद इरादे
क्या इसी दिन के लिए
तुमने मुझे अपनाया था।
मैने तुम्हे अपनी जुल्फों में
कैद कर के इसलिए रखी थी कि,
बुरे वक्त में तुम मुझे साथ दोगे
ज़माने के बीच तुम मुझे अपनाओगे
वाह !!! मुहब्बत करने का क्या यही अंजाम है ?????????

फुर्सत

June 24, 2021 in शेर-ओ-शायरी

एक सुबह चाय ने मुझ से कहा
फुर्सत हो तो क्यों नहीं बैठ जाते।
तुम्हारे मन मस्तिष्क को हम
अंदरुनी ताजगी से भर देते।।

मंजिल मिल गई

June 24, 2021 in शेर-ओ-शायरी

हम उन पर शेर लिखते गए
हमज़ेली भी दीवानी होती गई।
ख्वाबों के सिलसिला ऐसी चली
ज़िन्दगी की नई मंजिल मिल गई।।

नूर महल

June 23, 2021 in शेर-ओ-शायरी

रौशनी से नहा रहा है आज नूर महल,
मुद्दत बाद निकला है चाँद मेरे शहर मे ।
ए फीज़ा तुझे है काली घटा की कसम,
नज़र न लगाना तू मेरे नूर महल में।।

टक्कर

June 14, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हम भी एक महल बनाए है
उलफत के सरज़मीं पे
महफूज रहे मेरा महल
इसीलिए वफा की चादर
ओढा़या है हमने महल पे ।
देखें ज़ुल्म में कितनी ताक़त है
जो महल को हीला दे
चाहत की जंजीर से
इसे बांधा है हमने ।
आजमाइश होगी एक न एक दिन
किसकी होगी जीत
यह फैसला हो जाएगा
इन्तजार है हमें उस घड़ी की
जिस दिन कयामत
मेरे कायनात से टकराएगी।

बसंत बहार

June 10, 2021 in मुक्तक

बरसेगी धरती पे कब सावन के फुहार।
बता ए घटा कब आएगी बसंत बहार।।
मोर पपीहा भी मिलन के गीत गुनगुनाने लगे।
मन के बगिया मे सैंकड़ों फूल खिलने लगे।।

मिलन की प्यास

June 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आपकी चाहत के तलबगार है
हम।
आओ एक हो जाए हम।।
ढलती गोधूलि , उस पे हवा के झोंके।
उफ,,, रुत भी कहने लगी एक जान है हम।।

विचार

June 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हम तुम पले बढ़े अपने ही देश की छाँव में।
फिर क्यों दरार पड़ी आज अपने ही विचार में।।
अपनी इनसानियत को तो चंद सिक्के में बेच दिए।
ममता को गिरवी रख कर हैवानियत के चोला पहन लिए।।
आज चारो तरफ छल कपट द्वेष भावना दंगे फसाद।
लोभ लालच के जाल में फंस कर हो गए हैं सब बर्बाद।।
अपनी बेटी बहन बहू के लिए लगा दिए घर में किवार।
गैर की बेटी बहन बहू पर कर रहे हैं गंदी विघार।।
कहे अमित गंदी विचार अच्छे विचार पर हावी होता है।
शायद इसलिए आज सुनसान राहों में रावण राम बन कर घूमता है।।

दो गज़ ज़मीन

June 3, 2021 in शेर-ओ-शायरी

अश्कों के समंदर में ए खुदा
मुझे सिर्फ दो गज ज़मीन दे दे।
गर करने लगे वह अपनो से बेवफ़ाई
तब,ज़माना मुझे उसी में दफ़ना दे।।

नियत

June 2, 2021 in शेर-ओ-शायरी

काली मुलायम उड़ती जुल्फें तेरी,
इश्कबाज़ों पे कयामत ढाती है।
जब चले तू खुली वादियो में,
घटा की नियत भी बदलती है।।

क्या मैं पागल हूँ

May 31, 2021 in ग़ज़ल

दिल के कब्र में एक मर्तबा झाँक कर तो देख,
मैं उम्मीद की चिराग जलाए बैठा हूँ।
एक न एक दिन मुरादें होंगे पूरे मेरे,
वर्षों से यही उम्मीद लगाए बैठा हूँ।।
तेरी यादों के सहारे ए मेरे हमजोली,
अपनी जीवन की कश्ती सजाए बैठा हूँ ।
हर रात एक एक तारे आसमां से चुरा कर,
तारों से तेरा नाम दिल पे लिख बैठा हूँ।
अपनी तड़पती दास्तां के अनमोल पन्नों पे,
ख्यालों की कलम से अपनी ख्वाईश लिखने बैठा हूँ।
कहे अमित इश्क़ की दीवानगी भी क्या दीवानगी है,
जिसे देखो ज़माने से यही कहता है क्या मैं पागल हूँ।।

मैं

May 26, 2021 in ग़ज़ल

दिन रात शराब पी कर तंग आ गया हूँ मैं। बेवफा की नशा उतरता ही नहीं क्या हो गया हूँ मैं।। कभी इश्क़ से कोसो दूर रहा करता था मैं।आज इश्क़ के गुलाम बन कर रह गया हूँ मैं।। कभी न कोई गम था न कोई दर्द था आज़ाद पक्षी था मैं। किसी ने चलाया ऐसा तीर घायल हो गया हूँ मैं।। दिल की महफ़िल में आज अकेला रह गया हूँ मैं। कौन हूँ मैं, क्या हूँ मैं बस यही सोच रहा हूँ मैं।।

क्यों नहीं मांगी बेटा भगवान से

May 26, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

पूछी सास नयी नवेली दुल्हन से।
बोल बहू क्या मांगी है भगवान से
बहू शरमाती हुई सास से कही
बेटा मांगी हूँ भगवान से
सास मुंह चमकाती हुई कही
क्यों नहीं मांगी बेटा भगवान से
बेटे से वंश बढ़ता है यह जान ले
कैसे बढ़ाएगी वंश बेटी से
दुल्हन =ज़माना बदल गया है माँ
लाख गुणा बेटी अच्छी है
नये ज़माने के बेटे से
बेटियाँ भी कुल के नाम रौशन करती है
तो भला क्यों उम्मीद रखें आज के बेटे से
बेटे बहू खाना खाए बड़े बड़े होटल में
घर में माँ बाप आशा

मधुशाला

May 24, 2021 in शेर-ओ-शायरी

मधुशाला में ताला न लगाइए
अभी नशा चढ़ा ही नहीं।
कुछ यादें और ताजा होने दीजिए
अभी तक पैमाने को लब से लगाया ही नहीं।।

मरहम

May 24, 2021 in शेर-ओ-शायरी

यादों की मरहम भी क्या मरहम है।
बेरहम भी मरहम पर जीने लगे है।।
काश.. यह मरहम मर्ज़ नहीं होते।
हम और आप आज कैसे जी पाते।।

करोना चालीसा

May 24, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हे करोना दुःख के गागर।
जय महाकाल मृत्यु के सागर।।
जय करोना देव गोंसाई।
जो भजा वह जान गंवाई।।
बल में कहलाए बलधामा।
काल पुत्र दुःख सुतनामा ।।
कृपा हो जाए जिस पर तुम्हारी।
बन जाए वह बाल ब्रह्मचारी।।
जब से करोना नाथ पधारे।
रिश्ते नाते भाई बंधु छूटे हमारे।।

करोना चालीसा

May 23, 2021 in गीत

हे करोना दुःख के गागर।
जय महाकाल मृत्यु के सागर।।
जय करोना देव गोंसाई।
जो भजा वह जान गँवाई।।
काल करोना हर्ष उड़ आए।
दिव्य शक्ति से मार गिराए।।
बल में कहलाए वह बलधामा।
काल पुत्र दुःख सुतनामा।।
कृपा हो जाए जिस पर तुम्हारी।
रह जाए घर में बाल ब्रह्मचारी।।
जब से करोना नाथ आप पधारे ।
रिश्ते नाते भाई बंधु छूटे हमारे।।

करोना चालीसा

May 23, 2021 in गीत

हे करोना दुःख के गागर।
जय महाकाल मृत्यु के सागर।।
जय करोना देव गोंसाई।
जो भजा वह जान गँवाई।।
काल करोना हर्ष उड़ आए।
दिव्य शक्ति से मार गिराए।।
बल में कहलाए वह बलधामा।
काल पुत्र दुःख सुतनामा।।
कृपा हो जाए जिस पर तुम्हारी।
रह जाए घर में बाल ब्रह्मचारी।।
जब से करोना नाथ आप पधारे ।
रिश्ते नाते भाई बंधु छूटे हमारे।।

करोना चालीसा

May 23, 2021 in गीत

हे करोना दुःख के गागर।
जय महाकाल मृत्यु के सागर।।
जय करोना देव गोंसाई।
जो भजा वह जान गंवाई।।
काल करोना हर्ष उड़ आए।
दिव्य शक्ति से मार गिराए।।
बल में कहलाए वह बलधामा।
काल पुत्र दुःख सुतनामा।।
कृपा हो जाए जिस पर तुम्हारी।
रह जाए घर में बाल ब्रह्मचारी।।
जब से करोना नाथ आप पधारे।
रिश्ते नाते भाई बंधु छूटे हमारे।।

तक़दीर अपनी अपनी

May 2, 2021 in शेर-ओ-शायरी

हमें तो करोना ने लुटा, तक़दीर तो बहुत बलवान था।
एक दीप गलती से जली वहाँ, जहाँ आंधी तूफान था।।

हमदम न रहा

May 2, 2021 in शेर-ओ-शायरी

बदलते रिश्ते में हमने अपनो से नफरत देखी है।
खुदा की कसम ए दोस्त बहुत ही नाइंसाफ़ी है।।

इंसान और हैवान

May 1, 2021 in शेर-ओ-शायरी

मै इंसानियत को खोजने चला हूँ, हैवानों के बाजार में।
कहाँ छुपा है इंसानियत, जरा देखें तो उसे क्या हाल है।।

पेट और भेंट

April 30, 2021 in शेर-ओ-शायरी

एक तरफ करोना तो दूसरे तरफ पापी पेट।
अब तो रिश्ते भी चढ़ गए है करोना की भेंट।।

दो गज़ ज़मीन

December 23, 2020 in मुक्तक

मै उनके गली में दो गज़ ज़मीन मांगी
एक आशियाना बनाने को
उसने इतनी बड़ी शर्त रखी कि ,
मैं दंग रह गया
सोचने लगा मेरी इतनी औकात कहाँ
जो उनकी ख्वाईश को हम पुरा कर सके
मै वापस वहीं चला गया जहाँ
आशिक़ गम की समंदर में
डुबकी पे डुबकी आज भी लगा रहे है।

(हास्य कथा ) भागमभाग

December 22, 2020 in लघुकथा

बनवारी नया नया थानेदार बना था। गाँव में हमेशा छाती तान कर चला करता था। गाँव के लोग उन्हें काफी मान सम्मान दिया करते थे। बनवारी के चौबीस की छाती छत्तीस की तब होती थी जब कोई रास्ते में उसे टकरा जाता था। बेचारा वह राही डर के मारे रास्ते के एक तरफ हट जाया करता था। एक दिन शाम के समय बनवारी पुलिस की वर्दी पहन कर गाँव में धाक जमाने चल पड़े। गाँव के पगडंडी पकड़े जा रहे थे। अचानक उनको रास्ते में एक भैंसा मिल गया। अब बनवारी करे तो क्या करे। वह चारो तरफ देखा मगर उसे वहाँ कोई नजर नहीं आया । वह अपनी जान ले कर वहाँ से भागना ही बेहतर समझा । पीछे से भैंसा भी दौड़ने लगा। वह बार बार पीछे मुड़ कर देखते हुए आगे की ओर भाग रहे थे। कुछ दूर दौड़ने के बाद आगे चार जुआरी रास्ते के एक तरफ बैठ कर जुआ खेल रहे थे। अचानक उन लोगों की नजर बनवारी पर टिक गई। वे लोग वहाँ से डर के मारे आगे की ओर भागने लगे। आगे रास्ते के एक तरफ पाँच छह औरतें घास छील रही थी। उन लफंगो को अपनी ओर आते देख कर सभी औरतें डर गई। वे सभी एक छोटी सी झाड़ी में छिप गई। चारो जुआरी अपनी जान हथेली पे रख कर वहाँ से आगे की ओर बढ़ गए। तब जा कर सभी औरतें चैन की सांस लेने ही वाली थीं कि अचानक बनवारी पर नजर पड़ी। सभी औरतें फिर झाड़ी में छिप गई। बनवारी हांफते हुए आगे की ओर दौड़ता हुआ चला गया। सभी औरतें आपस में बतियाने लगी शायद वे चारो जुए खेल रहे होंगे। बनवारी ने देख लिया होगा। इसलिए सभी डर के मारे भाग रहे होंगे। तभी अचानक सभी औरतें भैंसा को अपनी ओर आते देखा। सभी औरतें डर गई। तुरंत ही झाड़ी में छिप गई। भैंसा भी वहाँ से आगे की ओर दौड़ता हुआ चला गया। सभी औरतों को यह माजरा कुछ समझ में नहीं आया। कुछ देर तक सभी औरतें चुप रही। फिर सभी मुंह पर हाथ रख कर जोर जोर से हंसती हुयी अपने घर के तरफ चल पड़ी।

यादों की बारात

December 20, 2020 in ग़ज़ल

मुझे ठुकरा कर काश तुम अपना जीवन संवार लेते।
तेरी बेवफ़ाई को ही हम अनमोल तोहफ़ा समझ लेते।।
मुझे यह दु:ख नहीं कि तुम मेरे हमसफ़र नहीं बन पाए।
दु:ख तो इस बात की है हम एक हो के भी एक हो न पाए।।
जीवन में हर शख्स को मुकम्मल प्यार नहीं मिलता।।
फिर भी यादों की बारात में यादों के फूल है खिलता।।

पहली प्यार की पहली निशानी

December 19, 2020 in ग़ज़ल

पहली प्यार की पहली निशानी ।
संभाल कर रखना ऐ मेरी रानी।।
यदि कल हम मिले या न मिले।
फिर भी गुलशन में गुल खिले।।
मिलन पे मौसम भी बेमिसाल है।
क्योंकि मुझे तुम से ही प्यार है।।
जुदा कर दे खुदा में दम नहीं ।
मुहब्बत है कोई खिलवाड़ नहीं ।।
दिल दिया है तो जान हम देंगे ।
सितमगर को हम परख भी लेंगे।।

बीस हज़ार का बेटा

December 18, 2020 in लघुकथा

अचानक दस साल के एक फुटपाथी बच्चे के कानों में किसी औरत की चीख सुनाई पड़ी। वह अपनी झोंपड़ी के बाहर आया तो देखा एक औरत खून से लथपथ बीच सड़क पर तड़प रही थी। वह झट से थाने के तरफ दौड़ पड़ा। वह दारोग़ा के सामने जा कर सब कुछ बता दिया। दारोगा तुरंत उस बच्चे को जीप पर बैठाया। वहाँ से चल पड़ा। घटना स्थल पर जैसे ही पहुँचा वैसे ही तुरंत एम्बुलेंस को फोन किया। गाडी पहुँची उसे उठाया और अस्पताल ले गया। सही समय पर उसे इलाज हुआ। सप्ताह दिन के अंदर वह ठीक हो गयी। जब पुलिस आयी रिपोर्ट लिखने के लिए तब वह औरत कही ” धन्यवाद। पुलिस वालों के कारण ही मैं बच पाई “। दारोग़ा ” धन्यवाद के क़ाबिल हम पुलिस वाले नहीं। यह दस साल के फुटपाथी बच्चा है। यदि यह समय पर थाने नहीं जाता तो, शायद आप अब तक जीवित भी नहीं रहती”। वह औरत अपनी आँखों में आंसू ले कर उसे गले लगाया। औरत – बेटा तुम्हारा नाम क्या है? तुम्हारे मम्मी पापा कौन है? तुम्हारा घर कहाँ है? बच्चा ” मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है। मम्मी थी वह भी चल बसी। मैं भीख मांग कर अपनी पेट पाल लेता हूँ। कोई मुझे मुन्ना कहता है तो कोई भिखारी कहता है। औरत –दारोग़ा साहब। मैं एक बांझ औरत हूँ। घर में अन्न धन की कमी नहीं है। कमी है तो सिर्फ संतान की।मैं इस लड़के को गोद लेना चाहती हूँ। आप लिखा पढ़ी के साथ यह लड़का मुझे दे दीजिए। मै इसे पढ़ा लिखा के बहुत बड़ा इनसान बनाउंगी। दारोग़ा ” ठीक है। आपका काम हो जाएगा। आप अपना रिपोर्ट लिखा दीजिए। औरत -मै अपनी कंपनी के मजदूरों के लिए सिलेरी बैंक से छुरा कर ला रही थी। शाम के यही कोई सात या साढ़े सात का समय था। अचानक एक बदमाश मेरी गाडी से टकरा गया। मैं कार से जैसे ही उतरी वैसे ही वह बदमाश मुझे दबोच लिया। वह मेरी कंपनी के पाँच लाख रुपये लूट लिए। मैं आवाज़ लगाई तो उसने मेरे सिर पर वार कर दिया। उसने चाहा कि इसे खत्म कर दूँ। मैने अपनी बचाव के लिए जोर से चीख पड़ी। वह डर से मेरे रुपये ले कर भाग गया। दारोग़ा रिपोर्ट लिख कर यह दिलासा दिलाया कि, शीध्र ही उस चोर को पकड़ कर आपके सामने लाउंगा। कल आप थाने आ कर लिखा पढ़ी के साथ इस बच्चे को गोद ले लीजिए। आज से यह बच्चा आपका हुआ। दस दिन गुजरने के बाद थाने से उस औरत के यहाँ फोन आया। वह उस बच्चे को ले कर थाने में पहुँची। दारोगा उस औरत को चार लाख अस्सी हजार रुपये देते हुए कहा – पहचानिए यही दाढ़ी वाला था”? औरत – हाँ ।हाँ । दारोग़ा साहब यही था। दारोग़ा ‘मुझे अफसोस है कि आपके बीस हज़ार रुपये इसमें कम है “।कोई बात नहीं दारोग़ा साहब मैं समझूंगी कि मै अपने बेटे अमन के लिए खिलौने खरीद लिया।

माँ की ममता

December 16, 2020 in लघुकथा

मूसलाधार बारिश हो रही थी। रात का समय था। एक गरीब माँ अपने एक साल के बच्चे के संग एक पेड़ के नीचे बैठी हुई थी। हर बार पत्तों से टपकता पानी उस माँ को भिगो रही थी। मगर वह माँ अपने बच्चे को छाती से लगाए बारिश के पानी से उसे बचाने का काफी प्रयास कर रही थी । उसे डर है कि मेरा लाल अगर भीग गया तो बीमार पर जाएगा । जब जब बच्चे के उपर पानी टपकता था तब तब वह औरत अपनी आंचल से उसे पोंछ दिया करती थी। आहिस्ता आहिस्ता उस औरत की पुरी साड़ी भीग गई। संयोग से बारिश भी थम गई। मगर वह अपने बच्चे को भीगने तक नहीं दिया। ऐसी होती है अपने बच्चों के प्रति माँ की ममता। धन्य है वह माँ जो खुद को भिगो दी मगर अपने बच्चो को भीगने तक नहीं दी।

आंधी

December 11, 2020 in शेर-ओ-शायरी

मेंने आशियाना बनाना छोड़ दिया।
जब से, आंधी के मौसम आ गया।।

मालिक सभी को सुनते है

December 10, 2020 in लघुकथा

एक बार अकबर बादशाह को प्यास लगी। वह अपनी प्यास बुझाने के लिए एक फकीर के झोंपड़ी के निकट गया। जब उसने आवाज लगाई तो एक बारह साल की बच्ची बाहर निकल कर फिर वापस अपनी झोंपड़ी में चली गई। कुछ देर बाद फकीर बाहर निकला।अकबर – मुझे प्यास लगी है। क्या पानी मिलेगा? फकीर हां हां कहते हुए बाल्टी के सहारे कुएँ से पानी ले कर अकबर के सामने खड़ा हो गया। अकबर ने पानी पीया। अकबर – तुम्हारे घर में वह नन्हीं सी बच्ची कौन है? फकीर -वह मेरी इकलौती बेटी है। अकबर -बहुत प्यारी बच्ची है। मै अकबर बादशाह हूँ। तुम्हें कभी भी किसी चीज की जरूरत पड़े तो मेरे महल में आ जाना। आज तक कोई खाली हाथ वापस नहीं लौटा है। क्योंकि अकबर किसी के एहसान नहीं रखता है। इतना कह कर अकबर वहाँ से चल पड़ा। समय यों ही गुज़रता गया। फकीर की बेटी जवानी की दहलीज़ पर कदम रख चुकी थी। फकीर दिन रात सोचा करता था कि कब अपनी बेटी के हाथ पीले कर दूँ। बस यही चिंता फकीर को हमेशा सताता रहता था। एक रात अचानक अकबर बादशाह की बात याद आ गयी। फकीर बहुत ही उम्मीद ले कर सुबह ही अकबर बादशाह के यहाँ पहुँच गया। अकबर फकीर को देखते ही कहा -आओ। देखो मेरा ठाट बाट। कहो ,तुम्हें मैं क्या दूँ ।माँगो दुनिया की हर चीज़ मेरे पास मौजूद है। फकीर आगे कहता कि अचानक अजान पर गयी। वह फकीर को कहा -तुम आराम करो। मै नमाज अदा करके आ रहा हूँ। अकबर की बातें फकीर को कुछ हज़म नहीं हुआ। वह अकबर के पीछे पीछे चल पड़ा। उसने अकबर को हाथ उठा कर कुछ मांगते देखा। वह सोचने लगा इतना बड़ा राजा को क्या कमी रह गई है जो उपर वाले से आज भी मांग रहा है। नमाज़ अदा करके अकबर फकीर के पास पहुँचा। फकीर -महाराज आप क्या मांग रहे थे अल्लाह से। अकबर -दूआ मांग रहे थे। फकीर -क्यों? अकबर -ए मेरी शान शौकत सब तो उन्हीं के देन है। आज मेरे पास धन दौलत सब कुछ उन्होंने ही दिया है। इतना सुन कर फकीर वहाँ से चलने लगा। अकबर ने कहा -तुम्हें कुछ नहीं चाहिए? फकीर -महाराज। मैं भी उसी मालिक से मांगुंगा जिस मालिक से आप सदा मांगते है। वह आपको सुनते है। क्या हमें नहीं सुनेंगे? अकबर उस फकीर को देखते ही रह गए। रास्ते में वह फकीर अपनी बेटी के ब्याह के लिए उपर वाले को सच्चे मन से याद किया। कुछ दूर आगे जाने के बाद उसे पैसों से भरा हुआ एक थैला मिला। उसी पैसे से अपनी बेटी के हाथ पीले कर दिए। तब से उस फकीर को यकीन हो गया कि मालिक सभी को सुनते है।

अधूरा प्रेम

December 9, 2020 in लघुकथा

अनीता नाम था उसका। देखने में सुंदर नहीं थी। फिर भी चंचलता व मीठे बोल से ही कब अमित उसका दीवाना बन गया उसे पता ही नहीं चला। उपर वाले ने गोरा रंग चुरा कर शाम रंग से उसे तराशा था। उसी शाम रंग का दीवाना था अमित। जब जब दोनो मिलते थे तब तब एक दूसरे के करीब आने का प्रयास करते थे। मगर उन दोनों मे इजहार नहीं हो पाता था। समय यों ही गुज़रता गया। धीरे धीरे अनीता किसी और की हो गयी ।अमित को तब पता चला जब एक दिन बड़ी मुश्किल से अपनी दिल की बात अनीता से कहा। अनीता दु:ख जताती हुई कही – अमित रिश्ते किसी का इन्तजार नहीं करता। जिसका किस्मत में था उसे मिल गया। मेरी शादी भी उस से होने वाली है। अपने जीवन में यह बात उतार लो – कोई भी लड़की पहले कदम नहीं बढ़ाती है। जब तक दिल से मजबूर न हो जाए तब तक वह पास नहीं आती है। इसलिए अगर किसी से प्रेम करना तो जल्द ही तब इजहार करना जब दोनों तरफ आग लगी हो।इतना कह कर वह वहाँ से चल पड़ी।

(लेख) नारी

December 8, 2020 in Other

आज नारी के पास क्या नहीं है। फिर भी पुरुष उसे अपनों से कमजोर ही समझ रहे है।जबकि,आज हमारी सरकार नारी के प्रति तरह तरह के शिक्षा दे कर पुरुष के मुकाबले में खड़ा करने का प्रयास कर रही है। यहाँ तक कि नारी प्रधान कई फिल्में भी बनी। अनेक साहित्यकार कलमें भी चलायी। सरकार नारी को नौकरी में आरक्षण भी दिया। नारी बखूबी मेहनत करके आई पी एस, जिला कलेक्टर, प्रोफेसर, पायलट व डाक्टर भी बन कर ज़माने को दिखा दी। फिर भी नारी को सही हक़ आज तक समाज में नहीं मिला। बलात्कार जैसे घीनौने हरकतें आज भी हो रहे है। नारी के इतिहास पर यदि हम गौर करें तो युगों युगों तक नारी पुरुष के अधीन ही रही है। इसका प्रमाण हम रामायण व महाभारत से ले सकते है। रामायण में एक बार रावण मंदोदरी से कहता है “ढोल शूद्र पशु नारी। यह सब है ताजन के अधिकारी”।। यह कथन इस युग के लिए सोचनीय है। महाभारत में दुर्योधन द्रोपदी को भरी सभा में वस्त्र हरण तक करवा दिया। इस तरह के कई उदाहरण हमारे ग्रंथ में देखने को मिल ही जाते है। आज भी हम पुराने ग्रंथ के अनुसार ही चलने का प्रयास करते है। नारी को कहीं भी उच्च स्थान नहीं मिला । मिला भी है तो भी आज नारी सुरक्षित क्यों नहीं है? यह हमारे देश की दुर्भाग्य है जो ,नारी पुरुष के संग कदम पे कदम मिला कर चलने के बावजूद भी उसे हवस के नजरों से आज भी देखा जा रहा है।

बेटी पढाओ अपनी शान बढाओ

December 7, 2020 in लघुकथा

कोमल हमेशा अपने माता पिता से डाट फटकार सुना करती थी। जबकि कोमल आठवीं कक्षा के छात्रा थी। पढ़ने लिखने में अपनी क्लास में अव्वल थी। सभी शिक्षक उसे मानते थे।प्रतियोगिता में बराबर बढ़ चढ़ कर हिस्सा भी लेती थी। बेशक वो समान्य ज्ञान हो या किसी विषय पर भाषण देना हो तो सबसे पहले कोमल का ही नाम आता था। इतनी गुणवान होते हुए भी माता पिता उसे हमेशा उच्च नजर से कभी देखा ही नहीं। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि, हमेशा कोमल के माता पिता बेटी को पराई घर की बेटी ही समझे। उन लोगों का यही सोच था कि बेटी से कहीं माता पिता के नाम रौशन हुआ है आज तक ? शायद इसलिए कोमल एक ही कक्षा में दो बार फेल भी कर गयी थी। सभी शिक्षक आश्चर्य में पर गये। फेल होने के कारण सभी शिक्षक पूछने लगे। तभी कोमल अपनी दास्तां उपस्थित शिक्षकगण के बीच बताती है — मैं हमेशा अपने माता पिता के आज्ञा मानती आयी हूँ। मैने कभी उनलोगों को निराश नहीं किया है। मै बहुत ही कठिनाई से आठवीं कक्षा तक पढी़ हूँ। मेरे अभिभावक के यह सोच है कि लड़की को ज्यादा पढ़ाने लिखाने से क्या फायदा ? आखिर चूल्हे चौके के ही काम करेगी। मेरा एक भाई है कमल जो,पांचवीं कक्षा के छात्र है। उसको पढाने लिए घर पर दो दो शिक्षक आते है ।मैने आज तक किसी भी शिक्षक से घर पर पढ़ी ही नहीं। वो तो अपनी सखी सहेली से नोट्स वगैरा ले आती हूँ। उस से ही परीक्षा की तैयारी कर लेती हूँ। लाख कहने पर भी पिताजी किताब ला के देते ही नहीं। लाड प्यार होता है क्या मैने आज तक जाना ही नहीं। मै अपने माता पिता के दोष नहीं दे रही हूँ। दोष दे रही हूँ अपनी तकदीर को । जो इतनी शिष्टाचार के पालन करते हुए भी अपने माता पिता के आँखों के तारा नहीं बन सकी। सभी शिक्षक दु:ख व्यक्त किए। कोमल की फ़रियाद किसी भी तरह शिक्षामंत्री के पास पहुँच गयी। उसे पढ़ने लिखने के लिए पैसे भी मिलने लगे। वह जी तोड़ मेहनत करना चाहती थी। मगर घर के काम से उसे फुरसत नहीं मिलता था। फिर भी अपनी मेहनत जारी ही रखी। समय का पहिया घुमता गया। वही कोमल दसवीं कक्षा में स्टेट लेवल पर प्रथम स्थान प्राप्त करके अपने माता पिता के नाम रौशन कर दिया। अखबारों में, टी. वी में हर जगह उसके माता पिता के नाम के साथ कोमल के नाम आता रहा। बेटी की कामयाबी देख कर कोमल के माता पिता कोमल को गले लगा लेते है। फूट फूट कर खुशी की आंसू बहाते हुए अपने समाज में ही चीख चीख कर दूसरों को यही कहते है बेटी पढाओ अपनी शान बढ़ाओ।

आठवां अजूबा

December 4, 2020 in लघुकथा

गुवाहाटी शहर कर्फ्यू से ग्रस्त था। जहां तहां शोर मची थी। रास्ते पे इन्सान तो क्या जानवर तक चलने में कतराते थे। सारा शहर भयाक्रांत की आगोश में समाया हुआ था। इतने में किसी औरत की आवाज़ मेरी कानो में टकराई- मेरे बच्चे को बचा लो। बुखार से तप रहा है। अरे कोई तो जाओ किसी डाक्टर को बुला लाओ। उस औरत की आवाज़ में करुणा थी। मेरा दिल पसीज़ गया। मै जैसे ही घर का दरवाजा खोलना चाहा वैसे ही मेरी पत्नी रोक कर कहने लगी “आपका दिमाग सही है? सारा शहर कर्फ्यू से ग्रस्त है। जहां तहां दंगे फसाद हो रहे है। उस पे रात के बारह बज रहे है।आप आठवां अजूबा बन कर उस औरत के बच्चे को बचाने चले है। अगर आप को कुछ हो गया तो हमारे दो बच्चों का क्या होगा। आपने यह सोचा है? पुनः मेरी कानों में उसी औरत की करुणा भरी फ़रियाद सुनाई पड़ी। मैं अपनी पत्नी को एक तरफ करते हुए बाहर निकल पड़ा। पास जा कर उस औरत को कहा – मैं डाक्टर को लाने जा रहा हूँ। आप बच्चे को ख्याल रखिए। मैं वहाँ से पागल के भांति दौड़ने लगा। कुछ दूर दौड़ने के बाद यह ख्याल आया कि क्या कोई डाक्टर इतनी रात को दंगा फसाद के माहौल में अपनी जान हथेली पर रख कर आएगा ? फिर यह ख्याल आया कि क्यों न समाज सेवक अरुण जी के पास जाउँ। वह तो बहुत बड़े आदमी है। फिर मैं अरुण जी के घर के तरफ दौड़ पड़ा। वहाँ पहुँचने के बाद मैं जो देखा बहुत शर्म में पड़ गया। वह पास के ही लोगों के संग प्रेम रसपान में मगन थे। मै मायूस हो कर वापस आ रहा था। अचानक पुलिस की गाडी आ कर मेरे सामने रुक गई। सिपाही मुझ पर ऐसे लपके जैसे मैं मोस्ट वानटेड हूँ। दारोग़ा साहेब कहे – क्यों बे। कहाँ जा रहा है? लाला के काले धन कहाँ छुपा रखा है “?उस दारोग़ा की बात मैं समझ नहीं पाया। मैं कहा -साहेब। एक औरत के मासूम बच्चा बहुत बीमार है। मैं डाक्टर को बुलाने निकला हूँ। यदि मैं समय पर डाक्टर को वहाँ नहीं ले गया तो वह बच्चा मर जाएगा। मेरी बात को दारोग़ा ने झूठ समझा। मुझे गाडी में बैठा कर ऐसे ले गया जैसे साजन चले ससुराल।

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