कहां आ गए हैं हम।

September 14, 2020 in शेर-ओ-शायरी

कहां आ गए हैं हम,
जहां खामोश-सी शामें हैं।
और चुप-सा सूरज उगता है।
ना बांटता है मुस्कान,
ना रौनकें फैलाता है।

नहीं मानते…..

September 14, 2020 in शेर-ओ-शायरी

नहीं मानते तकलीफ हम,
लहू के बहने का ।
जब मन के घाव गहरे हो,
जो न भरते हैं, ना दिखते हैं।

मेरे मन का मोती…

September 14, 2020 in गीत

मेरे मन का मोती,
मैं तुझको अर्पण कर जाऊं।
मेरे राम मेरे श्याम…
प्रभु मैं जपु तेरा नाम पल पल,
तुझमें ही खो जाऊं ।
मेरे मन का मोती ,
मैं तुझको अर्पण कर जाऊं।
मेरे राम मेरे श्याम ।
सुध लो प्रभु दुनिया की ,
यह नैन भी तरस गए ।
किस और किनारा है मेरा ,
बस नौका पार लगा दो ।
मेरे राम मेरे श्याम….
भूलूं कभी न तेरा नाम ,
यह अरदास जगा दे ।
तेरे से ही हो रौशन दुनिया मेरी,
तेरे पर ही वारी जाऊं।
मेरे मन का मोती मैं ,
तुझको अर्पण कर जाऊं।
मेरे राम मेरे श्याम….

कहां ढूंढू।

September 14, 2020 in मुक्तक

कहां ढूंढू में ऐसी भाषा कहीं,
जैसा बोलूं वैसा लिख पाऊं,
वो मैं मेरी हिंदी में ही पाऊं….

समा लेती है…

September 14, 2020 in मुक्तक

समा लेती है ,
हर भाषा को,
अपने भीतर ,
जिसकी कोई सीमा नहीं ,
वो पूर्ण है खुद से,
मेरी हिंदी जैसी कोई नहीं…

कारवां

September 13, 2020 in शेर-ओ-शायरी

कारवां तो गुजर ही जाएगा
जिंदगी का,वक्त के साथ।
चाहे वह गम का हो ,या सकुं का।

मैं तेरी मुस्कान चाहती हूं।

September 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मैं तेरी मुस्कान चाहती हूं,
तेरा हर अरमान चाहती हूं।
तू उड़ सके आजाद,
यह पैगाम चाहती हूं।
फिरे तू हर उन गलियों से,
जो गुजरती हो बुलंद नगरों से।
बीच में तू रुके ना तू,
कभी झुके ना तू ,
बस तेरी जीत हो ,
ये एहसास चाहती हूं।
मैं बस तेरी मुस्कान चाहती हूं।

तुम गुमान की मूरत…

September 13, 2020 in शेर-ओ-शायरी

तुम गुमान की मूरत बने रहो,
और मैं स्वाभिमान की प्रतिमा।

कुछ छुपा कर रखी थी यादें…

September 13, 2020 in शेर-ओ-शायरी

कुछ छुपा कर रखी थी यादें,
कुछ सपने भी संजोए थे ।
हम सपनों के करीब जाकर,
कुछ पल सिमट कर सोए थे।

तेरे होठों की मुस्कुराहट

September 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

तेरी होठों की मुस्कुराहट का,
अलग ही फलसफा है ।
जहां खोता हूं मैं ,
और दिल हंसता है ।
भूल जाता हूं ,
मैं इस अदब को ,
जिसे मोहब्बत कहते हैं।
जहां खोया रहता हूं मैं,
मशगूल होता हूं ,
तेरी मुस्कुराहट में ।
चाहता हूं मैं,
इसकी वजह बन जाऊं।
तुम हंसो गुलिस्ता की तरह,
और मैं इसका ,
गुलशन बन जाऊं…..

ऐ वक्त….

September 13, 2020 in शेर-ओ-शायरी

ऐ वक्त तू बहुत अच्छा है औरों के लिए,
मगर मेरे लिए कब तक बुरा रहेगा!

अनमोल थी तेरी यादें।

September 12, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

अनमोल थी तेरी यादें,
तेरे साथ की।
वह किस्सें बयान करती है,
चाहते हैं,
हम भी अनमोल हो जाते।
तेरी यादों की तरह,
छू लेते तुम यादों में कभी।
पर हकीकत से ,
उनका राब्ता ना होता।
तुम चाहते उन्हें पाना,
और तुम भी तड़पते,
उन यादों के लिए,
और हम फना हो जाते।
तुम्हारी अधखुली आंखों के,
खुलने से पहले।

तुम मुझे।

September 12, 2020 in शेर-ओ-शायरी

कुछ तरीके बताओ ना मुझे,
कैसे भूले हो तुम मुझे।

क्यों मनाएं किसी को।

September 12, 2020 in शेर-ओ-शायरी

क्यों मनाएं किसी को,
रूठना हमें भी आता है।
जो भूले बैठे हैं हमें,
भुलाना हमें भी आता है।

जिंदगी जी लेते।

September 12, 2020 in शेर-ओ-शायरी

बेखौफ होकर जिंदगी जी लेते,
अगर तुम्हें खोने का डर ना होता…

मुझे पता नहीं….

September 12, 2020 in शेर-ओ-शायरी

मुझे पता नहीं तुम्हें पाने का तरीका,
पर खोने का सबब आज भी याद है……

मैं लिखती हूं कुछ अलग-सा

September 12, 2020 in शेर-ओ-शायरी

मैं लिखती हूं कुछ अलग-सा,
मुझे इंसानों से ,न नफ़रत हैं,
बस करती, निंदा बुराइयों की,
दुःख देने की , न हसरत है।

सब कहते हैं!

September 12, 2020 in शेर-ओ-शायरी

सब कहते हैं! ज़माना बुरा है,
मगर ज़माना बना तो हम से ही है,
हम ढुंढते है खामियां औरों में,
क्या सारी अच्छाईयां हम में ही है!

ख्वाब।

September 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

अक्सर मैं भूल जाती हूं ,
अपनी राह।
ख्वाब अनेकों हैं,
अब खत्म है चाह।
कभी उम्र की सीमा रोक देती है,
कभी दूसरों की सलाह।
पर भुला कर बढ़ती हूं आगे,
फिर से उठते हैं,
यह सवाल।
कि कब बंधोगी!
उस बंधन में।
और मेरा होता है,
यही जवाब!
क्या मेरा सबके जैसा होना जरूरी है!
वही रोज;रोजी रोटी की बाट जोहना जरूरी है!
आज फुर्सत के चार पल चुरा लूंगी,
क्या यह सोचना जरूरी है!
जरूरी है कि मैं किस तरह जीना चाहती हूं,
किसी के साथ या किसी के बिना।
क्यों वही करूं जो सब चाहते हैं।
खैर छोड़ो ! अब मत पूछो यह सवाल।
मैं बस जीना चाहती हूं ,
अपने मुक्कमल ख्वाबों के साथ।

चलो विदा करते हैं…

September 11, 2020 in शेर-ओ-शायरी

चलो विदा करते हैं उन यादों को,
कब तक कैद रखे !
उन्हें यादों के पिटारों में।

आज भी….

September 11, 2020 in शेर-ओ-शायरी

आज भी आंखें सिर्फ उम्मीद के रंग ही तलाशती है,
क्या रंग नहीं देखे! इन आंखों से पूछो।

अभी भी…

September 11, 2020 in मुक्तक

अभी भी उम्मीद बाकी है,
अभी मेरी सांसों में सांस बाकी है।
कुछ छूने की ऊंचाईयां,
कुछ पाने की इच्छा
अभी मेरे सपनों में जान बाकी है।

पढ़ लेते हैं पन्ने जिंदगी के।

September 11, 2020 in मुक्तक

पढ़ लेते हैं पन्ने जिंदगी के,
जब हंसना हो या रोना हो।
अब भी उसी तरह दिखते हैं ,
वो बदलते ही नहीं ,
बीते वक्त के बाद भी।

आजाद किसे कहें!

September 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

आजाद किसे कहें?
सब बंधे हैं बंधन में।
हर शाम पंछी,
अपना घोंसला तलाशता है।
जहां चाह होती है,
अपने आशियाने की।
वह बोलते नहीं तो क्या,
दिख जाती है उनकी ममता,
जब चुग कर खिलाती है,
दाना अपने बच्चों को।
सिखाती है उसे उड़ना,
पंख फैलाकर,
आजाद किसे कहें ,
सब बंधे हैं बंधन में।

कुछ रिश्ते…

September 10, 2020 in शेर-ओ-शायरी

बहुत संभाल कर रखे हैं,
कुछ रिश्ते मैंने।
उनसे रूबरू भी होते हैं।
कभी हंस कर निभाते हैं,
तो कभी हंसा कर निभाते हैं।

हौसलों के पंख…

September 10, 2020 in शेर-ओ-शायरी

हम हौसलों के पंख भी लगा लेते
अगर उड़ने की चाह होती……

इतने कांटे पाए हैं…..

September 10, 2020 in शेर-ओ-शायरी

इतने कांटे पाए हैं मैंने राहों में ,
कि फूलों की चाह ना रही ।
इतने रास्ते बदले हैं मैंने पल-पल ,
कि मंजिल की चाह ना रही।

दोस्ती ना सही…

September 10, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

दोस्ती ना सही,
दुश्मनी तो मत निभाओ।
चार बातें बनाकर,
यूं ठहाके तो मत लगाओ।
यूं तो दिल सबका दुखता है,
उसे और ना दुखाओ।
माना तुम काबिल हो ,
अपने मुकाम पर।
मगर मेरी काबिलियत पर ,
यू सवाल ना उठाओ ।

वक्त का समुंदर

September 10, 2020 in शेर-ओ-शायरी

वक्त का समुंदर भी कम पड़ गया,
जब भूलने की बारी आई तो….

एक ही सवाल हैं

September 10, 2020 in मुक्तक

कितना समझें तुमको ,
यह तुम ही बता दो,
एक ही सवाल है तुझसे जिन्दगी,
तू क्या है? और क्यों है ?
बता दो ,
ना एक पहेली है ,
ना एक आईना है ,
जो सुलझा सकूं तुझे,
या देख सकूं तुझे।
न जरिया है,
न दरिया है ,
न मौन है ,न शोर है,
बता दे तू कौन है?

आंसू ठहरे थे

September 10, 2020 in शेर-ओ-शायरी

आंसू ठहरे थे उनकी पलकों पर ,
मगर गिरना नहीं चाहते थे ,
भीतर उठा था तूफान,
पर बहना नहीं चाहते थे।

ऐ! आयतें

September 10, 2020 in शेर-ओ-शायरी

ऐ !आयतें मुझे नजरबंद,
कर ले कहीं ,
काश ! कोई दुआ में,
पढ़ ले कहीं।

वक्त की सुई

September 10, 2020 in शेर-ओ-शायरी

वक्त की सुई कभी टूटती नहीं ,
मेरे साथ भी चलती है, तेरे बाद भी।

लड़की हूं!

September 9, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

लड़की हूं लड़की होने का,
दस्तूर निभा रही हूं।
न जता सकी उस प्यार को,
फिर भी निभा रही हूं।
शौक रखती थी कुछ पाने का,
अब उसे दबा रही हूं।
कभी कोई सोचता नहीं,
कभी कोई पूछता नहीं ,
तुम्हारी खुशी क्या है?
बस मौन रहकर,
सहमति जता रही हूं।
कर्तव्य है मेरा सेवा करना!
इसलिए बंदिनी बन,
जीवन निभा रही हूं।
ना चाहते हुए भी अपनाए हैं,
चाहे-अनचाहे रिश्तें,
फिर भी मुस्कुरा रही हूं ।
जहां बो सकती थी स्वार्थ के बीज,
वहां खुद ही काटे बिछा रही हूं ।
अब निस्वार्थ होकर मैं,
सिर्फ खुशियां लुटा रही हूं।
मैं लड़की हूं लड़की होने का,
दस्तूर निभा रही हूं।

किसका दिल टूटा नहीं।

September 9, 2020 in शेर-ओ-शायरी

कौन बचा है पूरा,
किसका दिल टूटा नहीं।
इन हसरतों की दौर में ,
कौन रोता नहीं !

पाकीज़गी अब दिखती नहीं।

September 9, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

पाकीज़गी अब दिखती नहीं ,
इन आबो-हवा में भी ।
कभी दम घुटता है तो,
कभी मन ।
कभी सास भी बेपरवाह हो जाती है ,
हां, यह रुख भी बदला है ,
अब सुकून देती नहीं,
चैन छीन लेती है ,तो कभी नींद।
परिवेश बदला है, या हम ।
पाकीज़गी अब दिखती नहीं,
इन आबो-हवा में भी।

चंद लम्हें तेरे साथ

September 9, 2020 in शेर-ओ-शायरी

दो पल का साथ,
पर था तो सही।
मुस्कुराए थे हम ,
कभी तो सही ।
क्यों दोष दें तेरे जाने का,
चंद लम्हे थे न मीठे।
तेरे साथ ,पर थे तो सही।

बड़े शहर की जिंदगी…

September 9, 2020 in मुक्तक

बड़े शहर की जिंदगी को छोड़ ,
अब छोटे शहर की जिंदगी को,
जीकर देख रहे हैं
यहां भी लोग हैं; वहां भी लोग थे,
यहां सोच बड़ी, वहां सोच छोटी ,
न निभाते हैं रिश्ते को,
न जानते हैं इंसानियत को,
कौन आपका अपना है,
कौन आपका पराया,
पर जुड़े हैं अब भी सब,
रुपए की चाह में,
हैसियत की छांव में…….

हर फासले की….

September 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी

हर फासलें की गहराई होती है
और कोई उतर कर नहीं देखता ….

तेरे हर दर्द की….

September 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी

तेरे हर दर्द की तासीर जानते हैं,
तेरे हर रंजो गम की वजह जानते हैं,
वो बेपरवाह है ,तेरे इश्क से ,
लेकिन तेरी रज़ा क्या है?
वो सब जानते हैं।

टूटे हुए अरमानों को बचा रखा है

September 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी

टूटे हुए अरमानों को बचा रखा है,
सबकी नजरों से छुपा रखा है ,
जी तो हम भी रहे हैं लोगों के बीच,
मगर अपने जज्बातों को दबा रखा है ,
किस पर यकीन करें या ना करें ,
जो बीत चुका है, उसे छुपा रखा है,
मगर थोड़ा-सा प्यार बचाए रखा है ,
समझे नहीं वह सच्ची मोहब्बत को,
नासमझ!
हमने भी अपना गुमान बनाए रखा है।

उनसे उम्मीद लगाना…

September 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी

उनसे उम्मीद लगाना बेकार हैं
क्योंकि शाम की खिड़की से ,
सुबह का उजाला नहीं दिखता।

सच की जमीन…

September 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी

सच की जमीन पर,
हम भी चल ना पाए ,
और औरों से उम्मीद लगा रखी है।

इमारतें

September 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी

इमारतें मजबूत हो तो,
साथ सभी का होता है,
वरना खंडहरों को,
कौन अपना आशियाना बनाता है।

शोर…

September 7, 2020 in मुक्तक

शोर भीतर भी है।
शोर बाहर भी है ।
ये ऐसा मंथन हैं।
जो चलता रहता है।
गुंजता रहता है।
हम शांत नहीं कर पाते।
बस बना लेते हैं।
शोर को अपनी आदत का हिस्सा।

बेफिक्र

September 7, 2020 in शेर-ओ-शायरी

बेफिक्र रहना आदत थी उनकी ,
कब जिम्मेदारियों ने दस्तक दी पता ना चला ।

बहुत दिनों के बाद…

September 7, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

बहुत दिनों के बाद ,
जब खोला मैंने यादों का पिटारा ।
कुछ बचपन की किलकारियां गूंजी,
कुछ मां की मीठी लोरी,
कुछ पापा की डांट मिली।
कुछ दिखे खेल पुराने जो खेलें अपनों संग,
कुछ बचपन के हमजोली मिले,
कुछ नटखट-सी शैतानियां ,
कुछ हार जीत का रोना मिला,
कुछ बचपन की नादानियां।
बहुत दिनों के बाद
जब खोला मैंने यादों का पिटारा ।

बचपन जल रहा है

September 7, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

बचपन जल रहा है,
जल उसे बुझा न सकेगा,
जल रहा है बड़ों की इच्छाओं के तले,
उनकी आशाओं के तले,
चाहते हैं पूरे हो सब ख्वाब,
पर कभी पूछते नहीं उनसे,
बांधकर एक सीमित दायरे में,
कैसे बचपन पल रहा है,
जहां टिमटिमाती आंखों में,
खेलकूद के सपने कम,
और जिम्मेदारियों का बोझ,
ज्यादा पड़ रहा है,
बचपन जल रहा है।

लफ्जों की पोटली

September 7, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

लफ्जों की पोटली ,
बांध लो ना तुम ,
क्या कहते हैं ,वो जरा
सुन लो ना तुम,
तब मांपना और तोलना ,
उनकी बातों को ,
फिर वह पोटली खोल देना तुम,
तर्क वितर्क के भीतर नहीं फंसोगे ,
इससे पहले ना बोलना तुम ।
रखते हो राय अगर अलग अपनी,
फिर ना झिझक ना तुम
अगर है सही विचार तुम्हारे,
तो उसे समझाना ,बतलाना जरूर ।
कहीं गर्म ना हो जाए बातों से मसला
लफ्जों की पोटली,
फिर से बांध लेना तुम।

तलब

September 7, 2020 in शेर-ओ-शायरी

तलब लग गई उनकी ,
उस प्याले की तरह है ,
जो हर बार इंतजार करता है
कि वो उसे फिर से भर दे।

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