Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • मेरी आँखों को ऐसी हँसी आ रही है

    मेरी आँखों को ऐसी
    हँसी आ रही है
    जैसे मोमबत्ती जलकर
    पिघलती जा रही है
    कुछ जल गई रौशनी की फिक्र में
    कुछ बेखबर-सी
    पिघलती जा रही है
    पिघल गई
    धागे को जलाने के जश्न में
    आधी जली तम मिटाने के लिए
    आधी पिघलकर
    खुदी में लिपटती जा रही है
    नश्वर है
    ये अंधेरा और रात का साया,
    बता रही है ये और
    मचलती जा रही है….

  • ये जिंदगी..

    सरल नहीं है ये जीवन,
    पर कठिन भी नहीं है इसे समझना
    जिस तुला पर तौलते हो औरों को तुम,
    किसी दिन उसी तुला पर,
    स्वयं को भी तौलना
    कभी जिंदगी का हंसाना,
    कभी पाली गलतफहमियां तो
    जिंदगी का यूं रुलाना
    कभी सज़ा है ये जिंदगी,
    कभी मज़ा है ये जिंदगी
    कभी भूल गए ग़म अपने,
    कभी देखें हम कई सपने
    कभी बिखरती हैं ख्वाहिशें
    कभी मिलती मुबारक रौशनी
    कभी आंसुओं से भरी हुई ,
    कभी सुबह सी निखरी हुई
    जिंदगी उलझन भी है,
    सुलझाओ तो सुलझन भी है
    कभी जल गए किसी के अरमान,
    कभी जल बरस के पूरे हुए
    कभी तपिश मिले जिंदगी से,
    कभी ठंडक का हो एहसास,
    कभी गुलशन सी लगे ज़िंदगी,
    कभी लगे खुशियों की तलाश
    मत जाना गुलशन में कभी,
    कांटे है बस अपनापन लिए,
    किस-किस को सुनाऊं दिल के अफसाने,
    कौन बैठा है फुरसत के क्षण लिए
    _____✍️गीता

  • कुछ समझ आता नहीं

    किस तरफ की बात बोलूं
    कुछ समझ आता नहीं,
    सत्य क्या है झूठ क्या है
    कुछ समझ आता नहीं।
    एकतरफा बात सुनकर
    धारणा कुछ और थी
    दूसरे के पक्ष को सुन
    कुछ समझ आता नहीं।
    बाहरी आभा सभी की
    खूबसूरत मस्त दिखती
    भीतरी हालत है कैसी
    कुछ समझ आता नहीं।
    पक्ष की अपनी हैं बातें
    फिर विपक्षी की दलीलें
    कौन सच्चा देशसेवी
    कुछ समझ आता नहीं।
    ठंड में ठिठुरा हुआ हूँ
    गर्म मौसम में झुलसता,
    कौन सा मौसम सही है
    कुछ समझ आता नहीं।
    पहले बचपन फिर जवानी
    सब अवस्था देखकर
    कौन सी स्थिति सही है
    कुछ समझ आता नहीं।

  • खुशियाँ तो

    खुशियाँ तो मन की
    उथल-पुथल से
    सीधी जुड़ी हुई हैं,
    मन में यदि संतुष्टि है
    तब हम जरा सी बात पर
    खुश हो सकते हैं,
    मजे में रह सकते हैं।
    मगर मन अनियंत्रित है,
    और संघर्ष का माद्दा नहीं है
    या संघर्ष कर पाने की
    परिस्थिति नहीं है ,
    तब हम न छोटी चीजों में
    खुश रह पाते हैं,
    न बड़ी चीजों तक पहुँच पाते हैं,
    बड़ी चीज और बड़ी चीज
    बड़ी से बड़ी चीज
    बड़ी का कोई अंत नहीं
    अस्थिर लालसा
    अस्थिर खुशी।
    प्रयास करना अनुचित नहीं है
    लेकिन मन को विचलित कर
    बेचैन रहना और
    छोटी-छोटी खुशियों को
    नजरअंदाज करना उचित नहीं है।
    छोटी खुशियों में खुश नहीं रहे
    व बड़ी खुशी आने तक
    खुद नहीं रहे,
    तब पाये तो क्या पाये
    जब क्षण नहीं रहे।
    —– डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय

  • तुम कब बाहर घर से

    निकलूं कब बाहर मैं घर से
    हरदम बैठा रहता मौसम के डर से
    एक साल में बारह महीने
    चार महीने गिरे पसीने
    फिर सोचूं मैं निकलूं बनके
    तब होती बरसात जमके
    आठ महीने यूं ही गुजरे
    फिर आए जाड़े की करवट
    बाहर निकले कांपे थरथर
    तुम ही बताओ बारह महीने
    ऐसे ही मौसम के डर से
    निकलूं कब बाहर में घर से।
    वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • कविता: मनमर्जियाँ

    चाहती हूँ एक कविता लिखना
    मगर नाकाम हो जाती हूँ
    विषय चुनने के लिए
    छटपटाती हूँ
    शब्द कुछ ऐसे हों
    भावनायें मेरी व्यक्त करें
    और कह दें
    वह जो मैं कह नहीं पाती हूँ
    निरर्थक है लेखन
    जब तक भाव ना सिमटें
    कविता में,
    पल्लवित ना हों इरादे
    प्रस्फुटित ना हों आकांक्षाएं और
    ना चल पायें
    मेरी मनमर्जियां….

  • कविता : यह कैसा धुआँ है

    लरजती लौ चरागों की
    यही संदेश देती है
    अर्पण चाहत बन जाये
    तो मन अभिलाषी होता है
    बदलते चेहरे की फितरत से
    क्यों हैरान है कैमरा
    जग में कोई नहीं ऐसा
    जो न गुमराह होता है
    भरोसा उगता ढलता है
    हर एक की सांसो से
    तन मरता है एक बार
    आज ,जमीर सौ सौ बार मरता है ||
    उसी को मारना ,फिर कल उसे खुदा कहना
    न जाने किसके इशारे से
    ये वक्त चलता है
    नदी ,झीलेँ ,समुन्दर ,खून इन्सानों ने पी डाले
    बचा औरों की नज़रों से
    वो अपराध करता है
    आज ,जीवन की पगडंडी पर
    सत चिंतन हो नहीं पाता
    तृष्णा का तर्पण करने पर ही
    तन मन काशी होता है ||
    ‘प्रभात’ कैसी है यह मानवता ,जिसमें मानवता का नाम नहीं है
    होती बड़ी बड़ी बातें ,पर बातों का दाम नहीं है
    मजहब के उसूलों का उड़ाता है वह मजाक
    डंके की चोट पर कहता ,भगवान नहीं है
    देखो नफ़रत की दीवारें ,कितनी ऊँची उठ गईं
    घृणा द्धेष की ईंटे ,आज मजबूती से जम गईं
    खोटे ही अपने नाम की शोहरत पे तुले हैं
    अच्छों को अपने इल्म का अभिमान नहीं है
    कहीं भूंखा है तन कोई ,कहीं भूंख तन की है
    पुते हैं सबके चेहरे ,यह कैसा धुआँ है ||

  • जुनून था तुमको हरगिज यार !!

    गज़ल
    ******************
    सुना तुमने नहीं हमको,
    सुना हमने नहीं तुमको
    मगर महसूस करते थे
    हर एहसास में तुमको
    जुनून था तुमको हरगिज यार!
    औरों की मोहब्बत का,
    सब कुछ जानते थे हम
    मगर रोंका नहीं तुमको
    सोंचा था ये हमने
    तुम मेरी परवाह करते हो
    जताते हो नहीं लेकिन
    मुझी से प्यार करते हो
    मगर जब तोड़ डाला दिल
    तो यह आया समझ हमको
    फकत तुम अच्छे लगते हो
    मगर ना दिल के अच्छे हो…

  • *अलविदा*

    सर्द मौसम में,
    अश्क भी जम गए
    अल्फाज उनके सुनकर,
    मेरे हर पल थम गए
    शून्य में घूमने लगा,
    मेरा वजूद सारा
    ज़रा सी धूप लगी तो,
    नैन हमारे नम गए
    अजीब था उनका अलविदा कहना,
    कुछ कहा भी नहीं कुछ सुना भी नहीं
    बस अलविदा कहा और विदा हो गए,
    क्या सच में वो हमसे जुदा हो गए..
    ______✍️गीता

  • “कुदरत का अनमोल रत्न”

    कुदरत का अनमोल रत्न
    ********************
    कुदरत का अनमोल रत्न है ये जीवन
    जब हों फूल से रिश्ते तो
    महकता है जीवन
    अगर हों बेनाम से रिश्ते तो
    सुगंध ही दुर्गंध बन जाती है
    फिर बोझिल- सा लगने लगता है जीवन
    स्वार्थ की पैनी दृष्टि जब
    पड़ती है रिश्तों पर
    कंकड़ की तरह
    चुभने लगता है जीवन
    बेबुनियाद जब अविश्वास
    पनप उठता है
    ताश के पत्तों के माफिक
    बिखर जाता है जीवन…

  • अन्यथा तम है अभी भी (गीतिका छंद में)

    अब सवेरा हो गया है,
    कब मुझे लगने लगे।
    अस्त सारा तम हुआ है
    कब मुझे लगने लगे।
    उग रही कोपल खुशी की
    दृगजल अब सुखना है,
    दूर मन का गम हुआ है
    कब मुझे लगने लगे।
    उठ रहे हैं प्रश्न मन में
    पूछते है बात खुद
    आस अब नूतन जगेगी
    कब मुझे लगने लगे।
    देश का यौवन चला है
    मार्ग पर उन्नति के अब
    कुछ उसे मौका मिला है
    जब तुझे लगने लगे।
    तब समझ जाना कि सचमुच
    में सवेरा हो गया,
    अन्यथा तम है अभी भी
    बस दिखावा हो गया ।
    पौध मुरझा सी रही है,
    क्या करें प्रातः से हम,
    देख, यौवन की हताशा,
    हो नहीं पाई है कम।
    इस तरह सब कुछ सही है
    किस तरह लगने लगे,
    जब नई कोपल हमारी
    हूँ व्यथित कहने लगे।
    ****** गीतिका मात्रिक छंदबद्ध पंक्तियाँ
    —- डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय

  • “आत्मीयता का अभाव”

    प्यार के हजारों रंग देखे
    मगर उन सभी रंगों में
    आत्मीयता का अभाव ही मिलता है
    लौटकर फिर
    तुम्हारे पास आ जाती हूँ
    फिर से उलझ जाती हूँ मैं
    बातों के जंजाल में,
    दुनिया के अनसुलझे प्रपंच में,
    ना पूरी हो सकने वाली अकाक्षाओं में….

    और बटोरने लग जाती हूँ
    दर्द, सिस्कियां, वैमनस्य भरे चेहरों की परछाईयां !!

  • कवि मंगलेश डबराल जी को नमन

    समकालीन कविता के
    जाने-माने नाम थे वह,
    हिंदी कविता की
    शान थे वह।
    राजनीतिक चेतना व
    मानवता की सुरम्य आभा से
    सरोबार थे वह,
    ‘पहाड़ पर लालटेन’ सी
    चमकती
    पहचान थे वह।
    संघर्ष में जूझती
    मानवता के अल्फाज थे वह
    शीर्ष कवि
    मंगलेश डबराल थे वह।
    आज उनके परलोक गमन पर
    शत-शत नमन और श्रद्धांजलि है
    ईश्वर के चरणों में स्थान मिले
    उस महान कवि आत्मा को
    सादर नमन व श्रद्धांजलि है।

  • ठंड बढ़ती जा रही है

    ठंड बढ़ती जा रही है
    वह सिकुड़ता जा रहा है
    रात भर सिकुड़ा हुआ
    तन अकड़ता जा रहा है।
    सिर व पैरों को मिलाकर
    गोल बन सोने लगा,
    नींद फिर भी दूर ही थी
    क्या करे, रोने लगा।
    यूँ तो मौसम सब तरह के
    कुछ न कुछ मुश्किल भरे हैं,
    ठंड की रातों के पल पल
    और भी मुश्किल भरे हैं।
    छांव होती गर तुषारापात के
    पाले न पड़ता,
    काट लेता ठंड के दिन
    इस तरह जिंदा न मरता।
    पांच रुपये जेब में थे
    पेटियां गत्ते की लाया
    मानकर डनलप के गद्दे
    भूमि पर उनको बिछाया।
    क्या कहें ठंडक भी जिद्दी
    भेदकर गत्तों का बिस्तर
    आ रही थी नोचने तन
    बेबस था वह फुटपाथ पर।
    —— सतीश चंद्र पाण्डेय

  • मैं पुहुप हूँ गांव का

    मस्तमौला चाल मेरी
    मैं पुहुप हूँ गांव का
    आ गया तेरे शहर
    कंटक समझ मत पांव का।
    घूमता बेघर फिरा हूँ
    है मनोरथ छांव का
    जिंदगी वारिधि सरीखी
    क्या भरोसा नाव का।

  • मुस्कान में रहता हूँ

    श्वेत कागज में
    कलम घिसता हूँ,
    इधर-उधर की
    कहीं कुछ भी नहीं
    जो है दिल में
    उसे लिखता हूँ।
    विजुगुप्सा से
    दूर रहता हूँ
    प्रेम के भाव बिकता हूँ।
    मिट्टी में खेलते बच्चों की
    सच्ची पहचान में रहता हूँ,
    सड़क पर पत्थर तोड़ती
    माँ के
    आत्मसम्मान में रहता हूँ।
    बुजुर्गों के सम्मान में और
    युवाओं के अरमान में
    रहता हूँ।
    कवि हूँ हर किसी की
    मुस्कान में रहता हूँ।

  • जो भी लिखता है मन

    जो भी लिखता है मन
    स्वयं के लिए,
    प्यार-नफरत के भाव
    खुद के लिए।
    उसे न जोड़ना
    कभी भी
    अपने भावों के लिए
    अपनी चाहत के लिए।
    अलग ही रास्ते हैं
    न कोई वास्ते हैं,
    न कोई दूरियाँ
    न करीबियाँ हैं।
    मन के जो भाव लिखे
    लिखा जो दर्द यहां
    वो स्वकीय नहीं
    अनुभूतियां हैं।
    परानुभूतियों को
    उतारा कागज पर
    न समझो कि
    लिखा किस पर है।
    खुद के सुख के लिए है
    सृजन यह,
    खुद की रोमानियत का
    गीत है यह।
    गा रहा आँख बंद कर
    सुरीली- बेसुरी,
    खुद के सीने में
    चुभा कर के छुरी।
    निकलती वेदना को
    लिख-लिख कर
    दर्द दूजे का
    खुद में सह सह कर,
    जो भी सृजित हुआ
    वो कहता है,
    बिना किसी को किये
    लक्षित वह,
    खुद ही खुद में
    मगन सा रहता है।

  • दोधारी तलवार

    क्यों दोधारी तलवार से हैं लोग…
    क्यों सच को स्वीकार नहीं कर पाते हम लोग….

    जानते हैं कुछ साथ नहीं कुछ जाना
    फिर भी क्यों जोडने की होड़ में लगे हैं लोग…

    सब कहते है भगवान एक है
    फिर क्यों अनेक रूप साबित करने में लगे हैं लोग…

    कहते हो अपने तो अपने होते हैं
    फिर क्यों अपनों को बेगाना बनाने में लगे रहते हैं लोग…

    क्यों दोधारी तलवार से हैं लोग…
    क्यों सच को स्वीकार नहीं कर पाते हम लोग…।

  • वो लड़का मुझे बहुत मोहब्बत किया करता था

    गीतों में अपने जज्बात लिखा करता था,
    गीतों में मुझसे बात किया करता था
    हाथों में लेकर मेरा हाथ,
    घंटों चलता रहता मेरे साथ
    वो लड़का मुझे बहुत मोहब्बत किया करता था
    मैं लिखती थी,
    वो बहुत अच्छा गाया करता था
    मेरा लिखा मुझको ही सुनाया करता था,
    वो लड़का मुझे बहुत मोहब्बत किया करता था
    जब भी होती थी उदास,
    कोशिश करता था हंसाने की
    दूर जाती थी….
    तो बातें करता था पास आने की,
    खत भेजकर मुझको बुलाया करता था,
    वो लड़का मुझे बहुत मोहब्बत किया करता था
    आंखों में अश्क आते थे जब मेरे,
    बातें होती थी बिछड़ जाने की
    मेरे होठों पर रखकर हाथ अपना,
    मुस्कुराने की बात किया करता था
    वो लड़का मुझे बहुत मोहब्बत किया करता था
    फरमाइश करता था सदा मुस्कुराने की,
    बातें करता था चांद-तारे तोड़ लाने की
    मुझे दुनिया घुमाने की बात किया करता था,
    वो लड़का मुझे बहुत मोहब्बत किया करता था
    जब पायल बजती थी मेरे छम छम छम छम
    उसके घुंघरू करते थे रुनझुन-रुनझुन
    मुझे छम्मक छल्लो कहकर बुलाया करता था,
    वो लड़का मुझे बहुत मोहब्बत किया करता था
    खिल उठती थी उसको देखकर मैं गुलाब सी,
    मुझे गुलाब भेंट किया करता था
    वो लड़का मुझे बहुत मोहब्बत किया करता था
    ________✍️गीता

  • ठेस की आदत मलिन है

    चैन से अब सो रहा मन
    मत जगा अब आग तू,
    दूर हो जा स्वप्न से भी
    मत लगा अब आग तू।
    आग केवल शान्त है।
    भीतर पड़े हैं कोयले
    फूंक मत, रहने दे ऐसे
    मत जला अब बावरे।
    शांत जल तालाब का
    लहरें उठा कर खामखाँ
    मत अमन में विघ्न कर तू
    बात इतनी मान ना।
    राह अपनी शांत अपना
    दूसरों को ठेस मत दे,
    ठेस की आदत मलिन है
    यह बुरी लत फेंक दे।

  • *मांग की सिन्दूर रेखा*

    मांग की सिन्दूर रेखा
    ******************
    हर सुबह बड़े
    स्वाभिमान से सजाती हूँ
    अपनी मांग में लाल सिन्दूर
    मेरे रूप लावण्य में
    मैं स्वयं एक
    वृहद परिवर्तन पाती हूँ….
    मांग की सिन्दूर रेखा
    खूब लम्बी सजाती हूँ और
    मैं आत्मिक संतोष पाती हूँ
    यह मांग की सिन्दूर रेखा
    मेरे परिणय के
    सुंदर वट के समान है
    यह महावर
    मेरे आत्मगौरव का मान है…..
    मेरी मांग का सिन्दूर
    अन्तरिक्ष का ज्ञान है,
    मनचलों के प्रेम का
    अन्त है,
    लौकिक प्रेम की पराकाष्ठा है
    मेरे जीवन का मधुर आधार है
    ये मेरी मांग की सिन्दूर रेखा……

  • सुख-दुख जीवन का हिस्सा

    सुख -दुख जीवन का हिस्सा है,
    ये तो ज़िन्दगी भर का किस्सा है
    निराशा का भाव दे सुख की घड़ी,
    आशा का संचार करें, एक नज़र तारीफ भरी
    सुख देकर ही सुख मिलता है,
    दुख देकर ना कोई सुखी
    बारी-बारी जीवन में सुख-दुख आएंगे
    नहीं आए तो हम अनुभव कहां से लाएंगे
    रोते-रोते भेजा प्रभु ने,
    कुछ तो इसका कारण होगा
    आगाह किया था शायद हमें,
    इतना भी अच्छा ना जीवन होगा
    मीठी यादों से मीठी बातों से,
    जीवन को सुखी बनाना है
    सदा प्रेम से रहना मानव,
    सुख-दुख तो आना जाना है ।।
    ______✍️गीता

  • ढूंढो मेरा प्रेम पथिक !

    ढूंढो मेरा प्रेम पथिक !
    जाने कहाँ खो गया है
    कंकड़ीली-पथरीली राहों में
    विस्मृत-सा हो गया है
    उदासीन राहों में राही
    तुम भी भटक ना जाना
    मेरा प्रेम मिले जो कहीं
    उसे मेरी याद दिलाना
    देना मेरा हाल पता
    उसकी भी सुध लेते आना
    यदि वह माने बात तुम्हारी
    तो अपने संग ही ले आना…

  • फूल बोने होंगे

    फूल बोने होंगे
    परिवेश में अपने
    खुशबू लुटानी होगी,
    उल्फत जगानी होगी,
    नफ़रतों की सारी
    कड़ियाँ मिटानी होंगी।
    जो हो सके न अपने
    जो दूर जा चुके हों
    कहकर पवन से खुशबू
    उन तक ले जानी होगी।
    चारों तरफ प्रभंजन
    सौरभ लुटा दे ऐसा,
    सब एक सूत्र में हों
    कोई न ऐसा वैसा।
    हृदय खुलें सभी के
    खुल जायें नासिकापुट
    लें सांस प्रेम का सब
    अनुराग फैले निर्गुट।
    हर एक मन कुसुम की
    खुशबू का हो दीवाना
    अनुरक्ति रस में डूबा
    हर्षित रहे जमाना।

  • मैं चाँद निचोड़ के लाया हूँ…

    पलकों पर सजे थे सपनें
    मैं थी नींद के आगोश में,
    वो आया सपनों में मेरे
    बोला मुझसे हौले से;
    पी लो रानी! प्रेम का प्याला
    मैं चाँद निचोड़ के लाया हूँ
    तेरी खातिर आसमान से
    तारे भी ले आया हूँ
    मांग सजा दूं आ तेरी
    मैं रंगीन सितारों से
    तेरे आँचल में रख दूं
    तोड़ के फूल बहारों से
    रजनीगन्धा महकेगा
    नित तेरी जुल्फों में
    यह कहकर वो अदृश्य हो गया
    मेरी सोई पलकों में,
    जब खोली आँखें मैंने
    अश्क जमे थे अलकों में……

  • हम किसान धरने पर

    एक तो शीतलहर
    दूजा बेगाना शहर।
    फिर भी अटल रहेंगे
    हम किसान धरने पर।।
    हम क्यों माने हार बंधु
    हम तो हैं अन्नदाता जग में।
    पेट चले संग फैक्टरी चले
    व्यापार पले अपनी पग में।।
    मांग नहीं अपनी सोना है
    ना मांगें हीरा-मोती हम।
    अपनी फसल के घटे दाम
    कभी न बर्दाश्त करेंगे हम।।
    आलू होवे दो की अपनी
    लेज बिके चालीस की।
    अपना चिप्स बना खाऐंगे
    मनो बात ख़ालिस की।।
    विनयचंद ना दुखी रे
    जिसका हम सब खाते हैं।
    हट जा बादल नभ मंडल से
    स्वर्ग लूटने हम आते हैं। ।

  • “मैं हलधर हूँ कहलाता”

    नाखूनों से नोंच जमीं
    मैंने बोया है
    मेहनत का बीज
    हलधर हूँ कहलाता
    चाहे कह लो
    पीर-फकीर
    पीता हूँ कुआं खोदकर पानी
    बीती निर्धनता में जवानी
    पर अपनी मेहनत से
    भरता हूँ
    मैं सबका पेट
    आज मुसीबत
    आन पड़ी
    हक पे अपनी बात अड़ी
    ‘भारत बंद है’ तो क्या हुआ ?
    कुएं में अभी भी भांग पड़ी
    जो होना होगा सह लेंगे
    छीन के अपना हक लेंगे
    खोदेंगे हम सूखी जमीं
    अश्रुओं से अपने सींचेंगे
    जो लेकर चाँदी का चम्मच
    पैदा हुए हैं राजकुमार
    वह हम क्षेत्रपाल की
    व्यथा को क्या समझेंगे..!!

  • आज की रात रहने दो

    आज अपनी बात करो
    मेरी बात रहने दो
    नींद नहीं है आती
    एक अर्से से मुझे
    जुल्फों में सुला लो
    तहकीकात रहने दो
    मुलाकातों के गुल
    खिला लेंगे किसी और दिन
    मुझे अपने ख्वाबों में
    आज की रात रहने दो’..
    यूँ तो तुम्हारी पायल
    मेरी हर धड़कन में
    झनकती है
    मगर जाओ !
    आज ऐसी बात रहने दो
    बड़ा अंधेरा है
    मेरे दिल की गलियों में साहब !
    उजाले अपनी यादों के
    मेरे साथ रहने दो…

  • बदल पाते

    दिन अगर बदल सकते
    पुनः अपने बचपन में लौट पाते ।
    फिर से पापा की नन्हीं परी बन
    चार पैसे की नेमचुस खरीद लाते।
    घर की चौखट पे बैठे,
    बाट देखती चाचू की,
    पटाखो के संग घरकुल्ला खरीद लाते।
    धान के नेवारी तले, पिल्ले को रख
    गभी उसकी भूख की चिंता
    कभी ठंढ से बचाने का डर
    भैया के संग मन से निकाल आते।
    ना अपनों के
    दूर जाने की फिक्र
    मिले फिर वो लम्हा
    जो हो दुनिया से इतर
    पुनः विश्वास की ज्योत जगा पाते ।
    अपनों का बदलना है भाता कहाँ
    कुछ भी हो, वो हमसे दूर जाता कहाँ
    कङवाहटे जिसने यह है घोली
    दोष उसका नहीं जो बनती है भोली
    यह टीस मिटा पाते कहाँ ।

  • लो फिर आ गई है सर्दी

    लो फिर आ गई है सर्दी
    पूरे लाव -लश्कर के साथ में।
    हवा भी ठण्ढी सूरज मद्धिम
    घना कुहासा दिन और रात में।।
    बिन बादल के बारिश जैसी
    गीलापन हर डाल -डाल व पात में।
    आठ नहीं हैं बजे अभी
    कम्बल में दुबके हैं सभी
    जैसे कर्फ्यू लग गई हो हर रात में ।।
    शबनम की बूंदें मोती जैसे
    तरुपल्लव और कुसुम कली पर।
    चम-चम चमक रहे हैं ऐसे
    टिमटिम धवल सितारे से नीलाम्बर।।
    दुबले भी मोटे दिखते हैं
    चढ़ा गरम कपड़े निज गात में।
    ‘विनयचंद ‘ इस सर्दी का तू
    कर स्वागत जज़्बात में।।

  • दीप्त जग हो गया सब

    सुबह-सुबह की लालिमा
    बिखरी हुई है सब तरफ
    ओस की बूंद मोती सी
    बिखरी हुई है सब तरफ।
    भानु का नूर है आलोक
    चारों ओर फैला,
    धरा-आकाश मानो बन गए
    मजनूँ व लैला।
    स्वच्छ पावन मिलन
    रात- दिन का हुआ जब
    सृष्टि होकर सुबह की
    दीप्त जग हो गया सब।
    कांतिमय हो दिशाएं
    खींचती ध्यान सबका,
    मनोरम खेल है यह
    सुहाना चक्र रब का।

  • मझधार

    हमें बस जीवंत बोध की दरकार है
    नहीं मुझे खुद पर, हाँ तुझपर एतवार है
    हम सजग प्राणी भले हैं
    पर स्वार्थ से सना अपना प्यार है ।
    स्वार्थ से रचा-बसा राब्ता
    यह बस नाम है अनुराग का
    राफ्ता-राफ्ता उधङती गयी धज्जियां
    अवशेष खुद का अहंकार है ।
    तादम्यता का दामन थाम के
    समझौते के बल पर जो बसा
    स्नेह का नामो-निशान नहीं
    डर-डर के रहे फिर भी टकरार है ।
    हर क़दम को फूक -फूक कर रखा
    बढने से पहले खुद से कहा
    कबतक यूँ सहते रहोगे
    ले डूबा वही समझा जिसे
    मझधार है ।

  • बाँसुरी की तान पर राधा दीवानी हो गई

    बाँसुरी की तान पर
    राधा दीवानी हो गई
    मीरा दीवानी हो गई
    प्रज्ञा’ दीवानी हो गई
    छेंड़ता मुझको है नटखट
    नंदबाबा का दुलारा
    छोंड़े ना मोरी कलाई
    ब्रज की गोपिन का है प्यारा
    प्रज्ञा लिखकर प्रेम पाती
    अपने मोहन को मनाती
    सारी-सारी रात राधा
    वृंदावन में रास रचाती
    प्रीत में सुधबुध को खोकर
    हरि की प्यारी हो गई
    बाँसुरी की तान पर
    राधा दीवानी हो गई…

  • कविता : जिस प्यार पे हमको बड़ा नाज था …

    जिस प्यार पे हमको बड़ा नाज था
    क्या पता था वो अन्दर से कमजोर है
    जिन वादों पे हमको बड़ा नाज था
    क्या पता था कि डोर उसकी कमजोर है ||
    करूँ किसकी याद ,जो तसल्ली मिले
    रात के बाद आती रही भोर है
    जिक्रे गम क्यों करें ,कोई कम तो नहीं
    थोड़े नैना भी उसके चितचोर हैं
    इतना दूर न जाओ कि मिल न सके
    प्यार की उमंगें ,हवा में बिना डोर है
    वो छिंडकते हैं नमक ,मेरे हर ज़ख्म पर
    क्या पता था कि सोंच ,कैद उनकी दीवारों में है
    जिस प्यार पे हमको बड़ा नाज था
    क्या पता था वो अन्दर से कमजोर है ||

    रोशनी हो गई अब ,तीरगी की तरह
    पास आकर मिलो ज़िन्दगी की तरह
    गम के लम्हे मुझे जो उसने दिये
    उनको जीता हूँ मैं ,अब ख़ुशी की तरह
    प्यार के वादों का ,उसपे कोई असर ही नहीं
    उसकी फितरत है बहती नदी की तरह
    बेवफाई का जिस दिन से खेल खेला गया
    अपने लोगों में मैं रहा अजनबी की तरह
    वक्त के दलदलों ने बदला चलन देखिये
    मुहब्बत भी पिघलती बर्फ की तरह
    सोंचता हूँ कहाँ दम लेगी ज़िन्दगी
    कुछ खटकता है दिल में कमी की तरह
    जिस प्यार पे हमको बड़ा नाज था
    क्या पता था वो अन्दर से कमजोर है
    जिन वादों पे हमको बड़ा नाज था
    क्या पता था कि डोर उसकी कमजोर है ||

  • आ अब लौट चलें

    जल जाती हूं ज्वाला सी,
    जब अरमान मेरे जलते हैं
    लेकिन तुम्हारी नेह-वर्षा से,
    वो धीरे-धीरे फलते हैं
    मीठे-मीठे बोल बोल कर,
    दुनिया वाले छलते हैं
    लेकिन तुम्हारी नेह-वर्षा से,
    वो जख्म भी ढ़लते हैं
    कुछ अच्छा कर पाएं कभी तो,
    दुनिया की नज़रों में खलते हैं
    लेकिन तुम्हारी नेह-वर्षा से,
    अरमान मेरे पलते हैं
    जी ना करें इस जहां में
    जीने का जहां लोग छलते हैं
    आ अब लौट चलें कहीं पर,
    यहां से अब चलते हैं

    _____✍️गीता

  • इबादत

    इबादत है तू

    मेरे सांसों में समाई

    खो ना जाना

    रूठ ना जाना

    सह ना पाऊँगा

    ज़िन्दगी में जिस चीज़ को चाहा है

    वो दूर हो जाती है

    कमी शायद मुझमें ही है पता नहीं

    जब सब ठीक चलता है

    तो तब डर लगा रहता है खोने का

    तेरी तस्वीर को पकड़े

    उन पलों को याद किए जाते है

    वही ज़िन्दगी का सहारा है

    अब किसी को उस तरह पास ना

    आने देता हूँ

    क्यों की तेरी जगह कोई नहीं ले सकता है

  • फेल रिजल्ट

    कविता -फेल रिजल्ट
    —————————-
    आज सारे,
    ख्वाब टूट गए,
    कभी सोचते थें,
    जो बैठ टहल कर,
    वो आज सारे ख्वाब टूट गए,
    मत भरोसा करो,
    इतना किसी पर,
    काम पूरा ना होगा,
    तो जमाना हसे
    सदा तुम्हीं पर,
    कल जिसे देखकर,
    नाज करते थें,
    रहें सलामत,
    दुआ करते थें,
    फोन पर उसकी छीक सुनकर,
    नींद हराम होती आवाज सुनकर,
    उसे गर्म पानी पिने की-
    सलाह दिया करते,
    देशी दवा करने की,
    बात किया करते,
    अदरक गुण की
    चाय बना लेना,
    मम्मी से फोन करके,
    काढ़ा बनाने की
    विधि जान लेना,
    रहें तुम्हारी जैसी भी हालत,
    हर समय की ,
    खबर देते रहना,
    आखिर दिया नही क्या उसे,
    क्या कमी रखा, बताएं मुझे,
    अरे….
    उसे ऐसे सभाला ,
    जैसे – माँ बच्चें को,
    कुम्हार कच्चे घड़े को,
    डाक्टर रोगी को,
    ड्राइवर स्टेरिंग को,
    तांत्रिक मंत्र को,
    सपेरा बीन को,
    माली फूल को,
    सभाला बहुत उसे,
    वह मुझे दर्द दिया,
    हाथों में फेल का
    रिजल्ट दिखा,
    क्या कहूं उसे,
    साथ रखूं उसे,
    या छोड़ दू उसे,
    इस हाल पर ,
    निकाल दू उसे-
    अपने अब ख्याल से,
    ना उसके उपर तरस खाऊं,
    किसी भी बात से,
    मुझे जितना निभाना था,
    निभा चुका हूं-
    अब करें अपना गुजारा,
    किसी भी राह से,
    अब बस इतना ही काम करुगा,
    करु अपने लिए दुआ,
    उसे भी याद करुगा
    ——————————
    **✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’

  • धोखेबाज दोस्त

    कविता- धोखेबाज दोस्त
    ——————————–
    हजार झूठे स्वार्थी दोस्त से अच्छा,
    एक सच्चा परम मित्र हो,
    नाज किया
    समय पैसा बर्बाद किया,
    वही दोस्त आइना दिखा जाते,
    डूबते हुए इंसान से-
    किनारे होकर भी, मुंह फेर लेते,
    इन उचक्के दोस्तों से अच्छा,
    एक बौना अशिक्षित मित्र हो,
    मेरी परेशानी मुसीबत में,
    सदैव सदैव मेरे साथ हो,
    ख्वाब में मेरा दर्द चीख सुनकर,
    उठे, फोन करके दुआ कर दें,
    मालिक भेज दे ऐसे मिलनसार को,
    अपनी हिचकी से मेरी याद समझ लें,
    आज भरोसा किस पर करूं,
    दो कौड़ी के दोस्तों पे करूं,
    जिससे कई बार चैट किया करते,
    इनका हाल जानने के लिए फोन किया करते,
    हमें पता नहीं था,
    इतना बेदर्द स्वार्थी-
    घमंडी चापलूस मतलबी मेरे यार हैं,
    जिन पे किया अपार भरोसा हूं,
    वही सबसे बड़े, झूठे मक्कार मेरे दोस्त हैं,
    विश्वास हो गया,
    मेरे मित्रों की मित्रता का पता चल गया,
    लगा लाकडाउन तो,
    जो छिपा था, और आज खुल गया,
    फसा शहर में जब अकेला,
    किससे बात करें ,
    प्यार का खिले उजाला,
    कोई फोन उठाकर काट दें,
    कोई फोन ही उठाएं ना,
    कोई ब्लॉक कर के रख दिया
    कोई चुप रहने का सलाह दिया,
    जिसे सुबह शाम ,फोन पर सलामी ठोकते,
    वही दोस्त मुझे शैतान कह दिया,
    डूब रहे निराशा में,
    घुट घुट के जी रहे हैं रूम पर,
    कान खोलकर,सुनो जमाने के लोग तुम,
    मित्रता करो पशु जानवर से,
    मत मित्रता करो ऐसे इंसान से,
    जो हाल तुम्हारा ना सुने,
    अपने व्यंग बाणों से बेहाल कर दें,
    मित्रता करो उस इंसान से,
    जो दुश्मन होकर भी तुम्हारा साथ दें,
    हो गरीब पर दिलवाला हो,
    जुबान से गूंगा, पर समझने वाला हो,
    हर अंग से क्षतिग्रस्त हो,
    रोगी कोढ़ी पागल आओ मेरे पास
    उसे पलकों की छांव में रखकर-
    प्यार करने वाला हूं,
    बस अपने दर्द के जैसा,
    मेरा भी दर्द समझे,
    मैं उसे भगवान की तरह पूजने वाला हूं,
    ‘ऋषि’ की प्रार्थना खुदा बस इतनी हैं,
    जिस मित्र ने बुरे हाल में साथ दिया,
    हर पल की खबर लेकर मुझे प्यार दिया,
    मुझे कुत्ता बनाना अगले जन्म में
    रखवारी करूं अपने मित्र के घर परिवार की,
    खुदा मैं तुझसे अपने पुण्य कर्मों का फल ,
    इसी स्वरूप में मांगा हूं|
    ————————————————-
    **✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—

  • क्यूँ

    यह जख्म कोई नया तो नहीं
    फिर दर्द का अहसास
    इतना गहरा क्यूँ ?
    कयी सितम अपनों ने किये
    पर उफ ना आज तक हमने किये
    अबतलक जो बेधते लब्ज़
    असर कर न सके
    तेरे लव से सुनते ही
    हम सह न सके
    तुझसे मिले अलफाज
    दे गया सदमा क्यूँ ?
    पल-पल चोट मिलते रहे
    शिकायतें करने की फितरत नहीं
    कहने को बहुत कुछ हमको मिला
    कुछ और पाऊँ ये हसरत नहीं
    बढ़ते जा रहे कदम-दर-कदम
    खत्म होता नहीं रास्ता क्यूँ ?

  • उलझा हुआ कलमकार हूँ

    उलझा हुआ
    कलमकार हूँ,
    तमाम विषयों से घिरा
    चयन की छटपटाहट में
    लय से भटका हुआ हूँ।
    शब्द में निःशब्द भर
    मौन में गुंजायमान ला
    अंकित करने में
    असफल रहा हूँ।
    ठिठुरते बचपन की व्यथा को
    बेरोजगारी की पीड़ा को
    किसान की उलझन को
    बुजुर्ग की वेदना को,
    व्यक्त करने में
    असहाय सा रहा हूँ।
    खुद न समझ पाया कि
    किसके साथ खड़ा हूँ,
    या बेबस सा पड़ा हूँ।
    विसंगतियों से आंख मूँदकर
    पीठ दिखा कर खड़ा हूँ।

  • तुम्हारा ललित रूप

    छोटी- छोटी पंक्तियाँ हैं
    ये जो शायरी की मेरी,
    इन्हीं में तुम्हारी सब
    खूबसूरती है भरी।
    उपमान नए औऱ पुराने
    मिला जुला के,
    वर्णन जैसा भी किया
    सच सच किया है।
    देर रात चाँद आया
    तब तक सो गए थे,
    आधी नींद आ गई थी
    शाम होते खो गए थे।
    अंधेरे में ढूंढते ही
    रह गए थे सौंदर्य को
    खोजना था चाँदनी में
    खुद हम खो गए थे।
    जैसे जैसे सुबह में
    आँख खोली रोशनी ने
    तुम्हारा ललित रूप
    देखते ही रह गये थे।

  • कविता : इंसान ईश्वर के रहस्य को समझ पाया नहीं है

    मौत के बाद क्या है

    किसी ने जाना नहीं है

    प्रकृति को क्यों

    किसी ने पहचाना नहीं है

    आखिर मृत्यु के रहस्य को

    ईश्वर ने क्यों छिपाया

    इंसान ईश्वर के रहस्य को समझ पाया नहीं है ||

    क्यों नहीं बन पाया

    वो दूसरा चांद तारा

    क्यों नहीं बना दूजा ,सूर्य सा सितारा

    बरमूडा ट्राएंगल का ,रहस्य क्यों न सुलझा

    कैलाश पर्वत पर क्यों

    कोई चढ़ पाया नहीं है

    इंसान ईश्वर के रहस्य को समझ पाया नहीं है ||

    क्यों नहीं बनी दूजी नदियां

    क्यों नहीं बना दूजा समुन्दर

    क्यों नहीं बनी हवाएँ ,खिलती हुई घटाएं

    इंसान मृत व्यक्ति को

    क्यों जिला पाया नहीं है

    इंसान ईश्वर के रहस्य को समझ पाया नहीं है ||

    जीव एक बार चला गया ,यहाँ फिर नहीं है आना

    फिर न कोई अपना है ,न कोई बेगाना

    अकेले है आना ,अकेले है जाना

    जीवन मरण का रहस्य ,कोई जान पाया नहीं है

    इंसान ईश्वर के रहस्य को समझ पाया नहीं है ||

    पढ़ लिख कर सब अपना करियर बनाते

    जीवन सुरक्षा के लिए पॉलिसी कराते

    अगले जन्म का करियर कैसे बनेगा

    कोई क्यों सोंच पाया नहीं है

    इंसान ईश्वर के रहस्य को समझ पाया नहीं है ||

    ‘प्रभात ‘ ईश्वर को न हिन्दू ,न मुसलमान चाहिए

    भगवान को सिर्फ एक नेकदिल इंसान चाहिए

    मन्दिर न चाहिए ,न उसे मस्जिद चाहिए

    धरती को स्वर्ग बना दे ,उसे ऐसा व्यक्तित्व चाहिए

    बड़ी बड़ी बातें करने वाला

    रक्त भी बना पाया नहीं है

    इंसान ईश्वर के रहस्य को समझ पाया नहीं है ||

  • अरी सरिता

    अरी सरिता,
    न रुक
    चलते ही बन
    चलते ही बन।
    राह में सौ तरह के
    विघ्न हों,
    उनको बहा ले जा,
    पत्थरों को घिस
    पीस दे सब नुकीलापन,
    पकड़ ले मार्ग तू अपना
    न ला मन में तनिक विचलन।
    बना दे रेत पाहन की
    किनारे श्वेत हो जायें
    रोकना चाहते हों मार्ग जो
    तुझमें ही खो जाएं।
    स्वयं का मार्ग तूने ही
    बनाना है,
    समुन्दर तक पहुंचना है,
    सतत प्रवाह रखना है।

  • भारत रत्न डा. राजेन्द्र प्रसाद जी के जन्मदिन पर विशेष

    तीन दिसम्बर अठारह सौ चौरासी
    का पावन दिवस मनोहर था।
    घर-घर मंगल गान गुंजते
    बजे बधाईयाँ संग सोहर था।।
    आसमान से टपक सितारा
    आया बिहार के एक गांव में।
    सारण उर्फ सीवान जिले के
    जीरादेई नामक सुंदर गांव में।।
    लाल थे वो महादेव सहाय के
    कमलेश्वरी देवी के आँखों का तारा।
    पाँच भाई-बहनों में राजेन्द्र
    थे सबसे छोटा और सबसे प्यारा ।।
    जगदेव सहाय थे चाचाजी
    जमींदार बड़े और दिल के प्यारे।
    करते थे नित प्यार इन्हें और
    “बाबू-बाबू ” कह सदा पुकारे।।
    देर रात से पहले सोते
    और जग जाते तड़के-तड़के।
    माँ- बापू और दादा-दादी
    सबको जगाते एक एक करके।।
    फ़ारसी पढ़े अंग्रेजी पढ़े
    हिन्दी उर्दू बंगाली का था ज्ञान।
    गुजराती और संस्कृत में भी
    देते थे बड़ सुन्दर व्याख्यान ।।
    जिला स्कूल छपरा और
    टी. के. घोष एकेडमी पटना रहकर।
    स्कूली शिक्षा पूर्ण किए और
    कलकत्ता विश्वविद्यालय में जाकर।।
    एल.एल. एम की डिग्री पाई
    गोल्ड मेडल के साथ -साथ।
    भागलपुर में करी वकालत
    जन सेवक बन साथ-साथ।।
    सत्य सादगी और सरलता
    सेवा धर्म को अपनाया था।
    चम्पारण के आन्दोलन में
    गांधीजी का संग पाया था।।
    विभिन्न पदों को किया सुशोभित
    सरकारी और निजी संस्था।
    बचपन बीता धार्मिक बनकर
    रामायण में थी पूरी आस्था।।
    आजाद हुआ भारत जब
    राम राज्य का देखा सपना ।
    देकर बहुमूल्य सहयोग
    भारत को संविधान दिया अपना।।
    प्रथम नागरिक भारत का
    और राष्ट्रपति पद किया सुशोभित।
    छब्बीस जनवरी पचास से
    चौदह मई बासठ तक रहे सुशोभित।।
    भारत रत्न की मिली उपाधी
    बेशक भारत के एक रत्न थे ।
    मानव के कल्याण के खातिर
    करते सदा-सदा प्रयत्न थे ।।
    पटना के सदाक़त आश्रम में
    बीता उनका अन्तिम काल।
    अठाईस फरवरी उन्नीस सौ तिरसठ
    को जा समाए काल के गाल।।
    निधन सदा से देह की होती
    आत्मा नहीं कभी मरती है।
    मरकर भी महामानव की
    सुकृति सदा अमर रहती है।।

  • ओज कविता- शिकार किया करते है |

    ओज कविता- शिकार किया करते है |
    पीठ पीछे से वार सदा सियार किया करते है |
    हिन्द के जवान मुंह सदा हुंकार किया करते है |
    नापाक दुशमनों तुम हमे क्या आजमाओगे |
    सामने आओ हम शेर शिकार किया करते है |
    चूपके से घुस आए हमारी सीमा बोलो तुम |
    मुक्का कमर तोड़ बैरी चित्कार किया करते है |
    बढ़ाकर हाथ दोस्ती पीठ पीछे खंजर वालो |
    अहिंसा पुजारी हिन्द होशियार किया करते है |
    दिखा पटाखा एटम बम की धमकी न देना तुम |
    चौड़ी छाती हम राफेल हथीयार लिया करते है|
    काश्मीर हमारा था और रहेगा तिरंगा फहरेगा |
    पाक गैंग महबूबा तुम्हें गद्दार कहा करते है |
    खाते हो जिस थाली मे छेद उसी मे करते हो |
    देशद्रोहियों का तम्बू हम उखाड़ दिया करते है |
    बन रहा मंदिर भगवान सब मिल श्रीराम कहो |
    जाती धर्म की राजनित धिक्कार किया करते है |
    भारत मे रहना मगर भारत की नहीं सुनना है |
    सवींधान बिरोधियों हम सुधार किया करते है |
    देश बिरोधी बोली वालों सुन लो ध्यान लगाय |
    जीभ मे राख़ लगा हम उखाड़ लिया करते है |
    डालकर गिद्ध निगाह खून काश्मीर बहाया था |
    कर कत्लेआम पंडितो रातो रात मार भगाया था |
    भेज आतंकियों सीमा जवान सैकड़ो शहीद किया |
    खाया मार सैकड़ो बार पर उसने न सीख लिया |
    चढ़ आया कारगिल की चोटी बड़ी भूल किया |
    चलाया हमने भी तोप दुशमन को धूल किया |
    किया सर्जिकल स्ट्राइक सबको मटिया मेट किया |
    चुकाया बदला सबका जवानो ने सब सेट किया |
    मर मिट जाएँगे हम सिर हिन्द न झुकने देंगे |
    चला जो चक्र भारत का कभी न हम रुकने देंगे |
    शेरे हिन्द बीर जवान सदा ललकार किया करते है |
    हिन्द के जवान मुंह सदा हुंकार किया करते है |

    जय हिन्द |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • गुनगुनी धूप सी तुम

    बढ़ रही ठंड में
    गुनगुनी धूप सी तुम
    जिन्दगी में सुगंध फैलाती
    मनोहर धूप सी तुम।
    मुस्कुराहट इस तरह की
    नाजुक सी,
    ठोस के साथ में घुलती
    जरा सा भावुक सी।
    कभी आलिम
    कभी हो पागल सी,
    नेह से पूर्ण
    ढकते आँचल सी।
    किसी झरने की
    प्यारी कल कल सी
    भार्या ही नहीं तुम तो
    हो खुशियाँ पल-पल की।
    —–@भार्या।
    — सतीश चंद्र पाण्डेय

  • तवायफ़

    अश्कों का समन्दर है अँखियों में मेरी
    एक कागज की किश्ती कहाँ से चलेगी।
    है ये बदनाम बस्ती हमारी सनम
    इश्क की फिर कलियाँ कहाँ से खिलेगी।।
    रोकड़े में खरीदे सभी प्यार आकर
    प्यार की ज़िन्दगी पर कहाँ से मिलेगी।
    मजबुरियों ने मुझको तवायफ़ बनाया
    ‘विनयचंद ‘ बीबी कहाँ से बनेगी।।

  • चैन मिलता ही नहीं

    खोजती रहती है दुनिया
    चैन मिलता ही नहीं,
    यह सही है वह सही है
    मन कहीं टिकता नहीं।
    आजकल की बात ही
    कुछ अलग सी हो गई
    असलियत के रंग का
    खून भी दिखता नहीं।

  • मुस्कुराने की दवा चाहिए

    बहुत गमगीन हो रही ज़िन्दगी
    मुस्कुराने की दवा चाहिए।
    मर्ज बनकर खड़ी है नफरते
    प्यार की एक हवा चाहिए।।
    चाहते हैं सभी सेकना रोटियाँ
    तप्त-सा कोई तवा चाहिए।
    इन्सान बनकर रहे सर्वदा
    बनने को ना खुदा चाहिए।।
    प्रेम की दुनिया सलामत रहे
    हर नजर इश्के अदा चाहिए।
    ये ‘विनयचंद ‘ मायूस होना नहीं
    दिल दरिया दया पे खरा चाहिए।।

  • घड़ी

    एक छोटी -सी डब्बी में
    नाचती हैं सूईयाँ
    बेशक बन्द होकर।
    पर नचाती है
    सारी दुनिया को
    अपनी हीं नोंक पर।।
    न ठहरती है कभी
    न कभी ठहरने देती है।
    ये तो घड़ी है ‘विनयचंद ‘
    दुनिया को घड़ी बना देती है।।

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