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संपादक की पसंद

  • भोजपूरी पारंपरिक होली गीत – गोकुला के दुआर |

    भोजपूरी पारंपरिक होली गीत – गोकुला के दुआर |
    कान्हा आवा हाली हो गोकुला के दुआर |
    करा ना साजन तू हमके इनकार |
    कान्हा आवा हाली हो गोकुला के दुआर |
    बितले जड़वा आइल बहार बसंती |
    निरखे रूपवा तोहार हम तरसी |
    बहे लागल हो देखा फगुआ बयार |
    कान्हा आवा हाली हो गोकुला के दुआर |
    हाथ जोरी कान्हा कहे तोहसे राधा |
    होरी खेलब तोहसे नाही होई बाधा |
    श्याम करा तनी हो अब हमरो विचार |
    कान्हा आवा हाली हो गोकुला के दुआर |
    रंगवा लगाइब तोहे अबिर हम लगाइब |
    भरी पिचकरिया छलिया तोहे हम रंगाईब |
    तनि खेलिहा हमसे हो फगुआ के फुहार |
    कान्हा आवा हाली हो गोकुला के दुआर |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

  • झरना

    पर्वतों की गोद से निकल,
    झरने का जल बह चला।
    मिलन करूं मैं धरा से,
    यह कह कर चला।
    मिलन हुआ धरा से,
    पर उस मिलन में,
    घना ताप सहकर
    जल बना वाष्प,बने मेघ
    और बरखा बन बरस गया।
    जल पहुंचाया वहां तक मेघों ने,
    जहां जन जीवन जल को तरस गया।
    सफ़ल हो गया जीवन झरने का,
    झर-झर झरते कुछ कर गया।।
    _____✍️गीता

  • नारी

    नारी को न समझो खिलौना मनुज,
    वह भी एक इंसान है।
    जन्म देती है इंसान को,
    सोचो कितनी महान है।
    बन कर मासूम सी बिटिया,
    तुम्हारा घर महकाने आई है।
    बन कर बहन जिसने,
    सजाई भाई की कलाई है।
    करके विवाह तुम्हारे संग,
    घर जन्नत बनाया है
    तुम्हारी सहभागिनी बन,
    तुम्हारा वंश बढ़ाया है
    फिर किस कारण से ,
    उसे तुम तुच्छ कहते हो
    वह ममता की मूरत है,
    तुम्हारे परिवार को निज मान,
    बड़े प्रेम से अपनाया है।
    वह पावन अग्नि सी महान है,
    जिसने रची सृष्टि सारी है
    ज़रा सा ध्यान से देखो,
    खिलौना नहीं है नारी है।
    _____✍️गीता

  • कोमल सी दूब हो

    राहों में आपके
    कोमल सी दूब हो,
    पाने का हो जुनून मन में
    उमंग खूब हो।
    आ जायें जब कभी
    मायूसियों के दिन
    कुहरे के बीच भी
    थोड़ी सी धूप हो।
    मन साफ हो दिखे वो
    सच में हो सच की छाया
    भीतर वही भरा हो
    बाहर जो रूप हो।
    हर ओर हो उमंगें
    उल्लास का सफर हो
    मन सब तरफ रमा हो
    बिल्कुल न ऊब हो।

  • क़िताबें

    जब भी मन घिर जाता है अपने
    अंतर्द्वंदों की दीवारों से,
    जब मस्तिष्क के आकाश में छा
    जाते हैं बादल अवसादों के…!!
    तब
    छांट कर संशय के अँधियारों को,
    ये जीवन को नई भोर देती हैं,

    ‘किताबें’…..मन के बन्द झरोखें
    खोल देती हैं..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • ग़रीब का बच्चा

    कुछ दिनों से ,
    एक इमारत का काम चल रहा था।
    वहीं आस-पास ही,
    कुछ मजदूरों का परिवार पल रहा था।
    छोटे-छोटे बच्चे,
    दिन भर खेलते रहते कुछ खेल।
    एक दूजे की कमीज़ पकड़कर,
    बनाते रहते थे रेल।
    हर दिन कोई बच्चा इंजन बन,
    चलता था आगे-आगे।
    बाकी बच्चे डब्बे बन,
    पीछे-पीछे भागे।
    इसी तरह हर दिन,
    यही खेल चलता था
    और हर रोज एक बच्चा ,
    इंजन या डब्बे में बदलता था
    किंतु एक बालक सदा ही गार्ड बनता था,
    एक दिन मैंने उस बालक से पूछा,
    तुम क्यों ना बनते हो इंजन या डब्बा
    गार्ड ही क्यों बनते हो सदा
    क्या डब्बे बनने में न आता है मजा।
    वह बोला मेरे पास कमीज़ नहीं है,
    फिर कैसे कोई दूजा बालक मुझे पकड़ेगा।
    मैं तो गार्ड ही बनता हूं
    और इसी में खुश रहता हूं।
    मैं कुछ सोच रही तो बोला..
    बहुत जल्दी सीख लेता हूं
    ज़िन्दगी का सबक,
    ग़रीब का बच्चा हूं जी
    बात-बात पर ज़िद नहीं किया करता।।
    _____✍️गीता

  • भोजपुरी सरस्वती वंदना – विनवा के तार |

    भोजपुरी सरस्वती वंदना – विनवा के तार |
    झन झंकार बाजे माई तोर वीनवा के तार |
    हंस चढ़ी चली आवा माई हाली हमरे द्वार |

    अज्ञानी अनाड़ी तोहके हम हरदम पुकारेली |
    सुनर गोर रूपवा माई हम एकटक निहारेली |
    बल बुद्धि देतु माई करा हमरो उद्धार |
    झन झंकार बाजे माई तोर वीनवा के तार |

    दुनिया मे केहु नईखे बिना तोहरे मोर सहारा |
    डलतू नजरिया हमरो मिल जात अब किनारा |
    तोहरों चरनिया पूजे माने सारा संसार |
    झन झंकार बाजे माई तोर वीनवा के तार |

    रूपवा तोहार देवी खूब चम चम चमकेला |
    मनवा हमार बिना तोहरे डह डह डहकेला |
    बिदद्या के देवी शारदा भर दा झोलिया हमार |
    झन झंकार बाजे माई तोर वीनवा के तार |

    अँखिया के लोर मोर टप टप टपकत बा |
    ज्ञान बिना भारती अब गली गली भटकत बा |
    किरीपा करा भवानी होखे मोर लेखनी सुधार |
    झन झंकार बाजे माई तोर वीनवा के तार |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

  • मैं अन्नदाता

    मैं अन्नदाता

    देख अपनी थाली में खाना रूखा सूखा,
    हो उदास सोचे किसान फ़िर एक बार,
    हूँ किसान कहलाता मैं जग में अन्नदाता,
    रहता साथ अन्न के, मिले मुझे ये मुश्किलों से,
    मेहनत मेरी रोटी बन भूख मिटाती जग की,
    न देख सके वो सुबह सुहावनी सब सी,
    पसीना मेरा शर्माए गर्मी जेठ बैसाख की,
    बैलों संग मेरे हल के धरा मेरी निखरती,
    बीज लिए आशाएं धरा के मैं बोता,
    आशाएं अब मेरी देखें बादल वो चंचल,
    आता सावन घुमड़ घुमड़ लाये मुस्कान,
    मेहनत फ़िर मेरी नवांकुर धरा खिलाए,
    दिन रात मेरे फसलों संग लहलहाएँ,
    देख फसलें मुझ संग मेरी धरा खिलखिलाए,
    सोना जग का सोना हमेशा गुमाये,
    सोना खोकर सोना फसलों का मैं पाता,
    धान मेरी धरा का अब घर घर जाए,
    मेहनत मेरी ढल रोटी में माँ की भूख मिटाये,
    भूख जग की मैं मिटाता सोता ख़ुद भूखा,
    करो गुणगाण जब रोटी का माँ की ,
    याद करना मेरी भी मेहनत मेरे वीरा।

    स्वरचित
    प्रतिभा जोशी

  • ऋतुराज बसंत

    ऋतुराज बसंत फिर आया है,
    जड़ पतझड़ फिर मुस्काया है।

    पेड़ पर हैं नव कोपल फूटी,
    फिर कोयल ने राग सुनाया है।

    पिली – पिली सरसों लहराई,
    भीनी खुशबू को महकाया है।

    छिप कर के बैठे थे जो पंक्षी,
    सबने मिलके पंख फैलाया है।

    हर्षित हुआ फुलवारी सा मन,
    तितली बन फिर मंडराया है।

    सरस्वती माँ की अनुकम्पा से,
    क्या लिखना हमको आया है।

    राही कहे खुलकर सबसे की,
    ऋतुराज बसंत फिर छाया है।।

    राही अंजाना

  • बसंत पंचमी

    माघ मास का दिन पंचम,
    खेतों में सरसों फूल चमके सोने सम।
    गेहूं की खिली हैं बालियां,
    फूलों पर छाई बहार है,
    मंडराने लगी है तितलियां।
    बहार बसंत की आई है,
    सुखद संदेशे लाई है।
    चिड़िया भी चहक रही हैं,
    हर कली अब महक रही है
    गुलाबी सी धूप है आई,
    कोहरे ने ले ली विदाई।
    पीली-पीली सरसों आने लगी,
    पीली चुनरी मुझको भाने लगी।
    नई-नई फसलें आती है,
    बागों में कोयल गाती है।
    भंवरे ने संगीत सुनाया है,
    फूल कहे मैं हूं यहां,
    तेरा स्वर कहां से आया है।
    शीत ऋतु का अंत हो रहा,
    देखो आरंभ बसंत हो रहा।
    मन में छाई है उमंग,
    खिलने लगे प्रकृति के रंग।
    वीणा वादिनी विद्या की देवी,
    मां सरस्वती का करें वंदन।
    लगा कर ललाट पर चंदन,
    बसंत पंचमी पर हाथ जोड़ कर,
    मां सरस्वती को शत्-शत् नमन।।
    _____✍️गीता

  • पायल को मीठी छम सी

    बातें बना रहे हो
    बेकार में अनेकों
    चाहत कहाँ है गुम सी
    पायल की मीठी छम सी।
    डग-मग कदम चले हैं
    जिस ओर हम चले हैं
    नजरों का फर्क क्यों है
    मन से तो हम भले हैं।
    चारों तरह सवेरा
    मन में घिरा अंधेरा,
    उग आई क्यों निराशा
    खुद से ही खुद छले हैं।
    सोते समय जगे हैं
    जगते समय हैं सोये
    पाया नहीं है पाना
    अश्कों में हम गले हैं।
    तुम भी रहे हो बहका
    समझे हो क्यों खिलौना
    मुस्का दो आज फिर से
    मैं तो हूँ, अब कहो ना।

  • गीत लिखा करती हूं

    अपने मन का हर भाव लिखा करती हूं,
    कभी-कभी दुख तो कभी,
    अनुराग लिखा करती हूं।
    छोटी-छोटी मेरी खुशियां
    लिखने से बड़ी हो जाती हैं।
    बड़े-बड़े दुख के सागर,
    फ़िर मैं पार किया करती हूं।
    कभी हंसाती हूं आपको,
    अपनी कविता से मैं,
    कभी दुखित हो कर एकान्त में
    नेत्र नीर बहा लिया करती हूं।
    कभी जुदाई में आंखें सूनी,
    कभी नेह लिखा करती हूं।
    कभी बुनती हूं ख्वाब सुहाने रातों में,
    कभी भोर के गीत लिखा करती हूं।
    हां मैं भी प्रीत लिखा करती हूं।
    कुछ अधूरी तृष्णाएं हावी होती हैं मन पर,
    उन्हीं तृष्णाओं की खातिर,
    मन-मीत लिखा करती हूं,
    गीता हूं मैं गीत लिखा करती हूं।।
    _____✍️गीता

  • आर्यन कृष्णवंशी का शायरी संग्रह

    1.
    जमाने की नजरों मे काफिर हैं हम
    क्योंकि मोहब्बत की मंज़िल के मुसाफिर हैं हम

    2.
    आने दो गर्मी तो पहाड़ पिघल जाएंगे
    चट्टानों को तोड़कर समुंदर निकल जाएंगे
    लड़कपन है नौजवानी है अभी कर लेने दो मस्ती
    कँधों पर भार आएगा तो खुद संभल जाएंगे

    3.
    आज मैं सोच रहा हूं कि आशिकी इतनी अजीब क्यों है ?
    जिससे मिलना असंभव लगता है वही दिल के करीब क्यों है !

    4.
    भगवान भी सब कुछ जान लेता है …
    समय तो बख्शता ही नही कठिन से कठिन इम्तिहान लेता है
    संघर्ष के इस दौर मे सफल वही होता है, जो सच के आइनें मे झूठ को पहचान लेता है

    5.
    मंजिल कठिन है तो क्या हुआ ? हम कौन सा कमजोर हैं ” चलते जाएंगे
    निकले हैं घर से तो कुछ करके दिखाएंगे …..
    वरना ऊंचा मुकाम पाने वालों का अंजाम है यही
    हम होंगे गुमनाम लोग कहानियाँ सुनाएंगे !

    6.
    आएं हैं तो दो चार दिन रुककर जाएंगे
    खायेंगे पियेंगे पब मे मस्ती उड़ाएंगे
    रात करेंगे रंगीन मोहब्बत के आशियाने मे
    छूट जायेंगी दिल की कुछ बातें तो कल फोन पर बताएंगे !

    7.
    आज फिर थोड़ा सा बैचेन हूँ कुछ अजीब सा लग रहा है
    प्यार है या नफरत ” बड़ा करीब सा लग रहा है !

    8.
    काफी मुद्दतों के बाद पसंद आई हो तुम
    इसलिये सपनों मे सजा रखा है
    कोई छीन ना ले जाये अब तुम्हे मुझसे
    इसलिये दिल मे छुपा रखा है !

    9.
    थोड़ा शरारती हूँ तो क्या हुआ करजदार तो नही हूं

    चालाकी से बेवफ़ाई करूँ इतना समझदार तो नही हूं

    10.
    जज्बात नही दिखते शायद काफी फांसला आ गया है
    अजीब सी महक आ रही है इस शहर मे…
    लगता है कोई दिलजला आ गया है !

    शायर ~
    आर्यपुत्र आर्यन कृष्णवंशी ” शनि ”
    ( टीबी आर्टिस्ट मॉडल एंड राइटर )
    Official Co – 9720299285

  • तुम्हारे लिए

    यह जीवन मेरा रहा है समर्पित
    हां बस तुम्हारे लिए।
    अपनी इच्छाओं के पंखों को
    अपने ही इन दोनों बाजुओं से
    टुकड़ों में बांट बिखेरा है हमने
    हां बस तुम्हारे लिए।
    अरमान मेरे ना गगन को चुमू
    इस धरा पर, तेरी होके जी लूं
    आश में खुद को तराशा है हमने
    हां बस तुम्हारे लिए।
    कभी साथ लेकर कहीं चलने में
    तकलीफ़ थी मुझे साथ रखने में
    अपनी तौहीन तुझी से सहा है हमने
    हां बस तुम्हारे लिए।
    तुझे सबसे ज्यादा चाहा है हमने
    तेरी सलामती ही मांगा है हमने
    मिटा के खुद को जिलाया है हमने
    हां बस तुम्हारे लिए।

  • पुलवामा शहीदों को नमन

    याद है हमको प्रेम दिवस ऐसा भी एक आया था!
    थी रक्तरंजित वसुंधरा, और आकाश थरथराया था!!

    एक कायर आतंकी ने घोंपा था सीने पर खंजर!
    ख़ून बहा कर वीरों का, बदला था वादी का मंजर!!

    चालीस जवानों का काफ़िला चीथड़ों में बदल गया!
    था ऐसा वीभत्स नज़ारा कि हृदय देश का दहल गया!!

    गूँजी दसों दिशाओं में माताओं की भीषण चीत्कारें!
    ख़ून नसों का उबल गया, आँखो से थे बरसे अंगारे!!

    भारत की रूह पे दुश्मन ने गहरा ज़ख्म लगाया था!
    लेकिन वीरों की हिम्मत को डिगा नहीं वो पाया था!!

    भारत के जांबाजों ने भी फिर ऐसा पलटवार किया!
    दुश्मन के घर में घुसके आतंकियों का संहार किया!!

    सैनिक जब अस्त्र उठाता है, तब देश सुरक्षा पाता है!
    वो देश के मान की रक्षा में सरहद पर शीश कटाता है!!

    प्रेमोत्सव मनाने वालों सुनो, जी भर जश्न मनाना तुम!
    जो मिटे हैं देश की रक्षा में ,उनको भूल न जाना तुम!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (14/02/2021)

  • मै हूँ ना

    आज valentine’s day है

    मौसम मनचला सा हो रहा है
    हर और इश्क खिल उठा है
    याद कर रही हूँ
    खूबसूरत लम्हों को,
    नही, मुझे नही याद आ रही
    वो कपड़े, गहने, फूलों की
    लम्बी फेहरिस्त….

    झंकृत कर रहे है मुझे
    वो बेशकीमती पल
    जब-जब रूह से रूह
    का एकाकार हुआ,
    भीड़ में तुम्हारा धीरे से
    मेरा हाथ थाम लेना,
    घबरा जाना मेरे बीमार होने पर,
    समझ जाना अनकही
    मेरे मन की बात को,
    और मौन नज़रों से
    तुम्हारा यह कहना
    “मैं हूँ ना”
    कर देता है पूर्ण
    हमारी प्रेम कहानी को।

  • राष्ट्रीय शोक दिवस

    बहुत दुख भरा दिवस है,
    आज राष्ट्रीय शोक का।
    टूटी थी किसी की राखी,
    और किसी मां की उजड़ी कोख का।
    इस दुख भरे दिवस को ,
    आज,प्रेम दिवस ना कहना।
    आज ही के दिन…..
    पुलवामा में ग़म के बादल आए थे
    याद करो उन वीरों को जो,
    घर ओढ़ तिरंगा आए थे।
    जला लहू पुलवामा में,
    जिन वीर जवानों का
    हाथ जोड़कर नमन है उनको,
    कोई और-छोर नहीं उनके बलिदानों का।
    कैसे स्वीकार करें आज गुलाब,
    वतन के शहीदों की आई है याद।
    हाथ जोड़कर नम आंखों से,
    आज श्रद्धांजलि अर्पित उन्हें,
    जो लौट के घर ना आ पाए,
    आज याद कर लो उन्हें।
    42 फौजी उस हमले में शहीद हुए,
    भारत के हर राज्य के लाल से धरा हुई थी लाल।
    आज अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करें
    प्रेम दिवस नहीं आज श्रद्धांजलि दिवस मनाएं।
    जब-जब मिली है उनकी शहादतो की ख़बर,
    लहू जलकर आंखों से निकला है।
    सुनते रहेंगे उनके शौर्य की कथाएं,
    देखो तिरंगे में फौजी निकला है।
    ______✍️गीता

  • इजहार का दिन है

    प्रेम के इजहार का दिन है प्यारे
    तू क्यों पीछे होता है,
    दे दे प्रिय को तोहफे में फूल,
    नहीं तो चुभेगा हृदय में शूल
    आँखों से बहेगी लघु सिंचाई की गूल
    इससे पहले कि हमारे भीतर
    उग आयें पुराने ख्यायलात
    रूढ़ि के वशीभूत हम
    मामले को दे दें तूल
    हैप्पी वेलेंटाइन डे कहना मत भूल..।
    अन्यथा हृदय में रह जायेगी कसक
    क्यों नहीं कहा होगा
    सोच कर भीतर चुभेंगे शूल,
    अतः कह डाल
    मिटा दे प्रेम पर पड़ी धूल,
    अभी भी समय है प्यारे
    हैप्पी वेलेंटाइन डे
    कहना मत भूल।
    उठ मुहब्बत के झूले में झूल
    मन में कांटों की जगह
    उगा ले फूल
    प्रिय को दे दे तोहफे में फूल।

  • भारत कोकिला

    हे भारत कोकिला!
    मुबारक हो तुम्हें जन्मदिन तुम्हारा।
    वतन के लिए कर खुद को समर्पित
    जीवन तेरा स्वतंत्रता को अर्पित
    हैदराबाद में जन्मी अघोरनाथ की सुता कहाई
    माता दी कवयित्री निज रचना की लोङी सुनाई पालना में जिनकी गुन्जती हो बांग्ला कविता
    पश्चिम तक गुंजायमान था स्वर तुम्हारा
    हे भारत कोकिला!
    मुबारक हो तुम्हें जन्मदिन तुम्हारा।
    मानवाधिकार की संरक्षक, गोविराज की भार्या
    किंग्स कौलेज लंदन में जिसने शिक्षा पाई थी
    ‘ गोल्डन थ्रैशोल्ड ‘ प्रथम कविता संग्रह
    ‘ब्रोकन विग’ से कवयित्री की प्रतिष्ठा पाईं थीं
    “केसर ए हिन्द” से नवाजित, आसमान तक फैला स्वर‌ था तुम्हारा
    हे भारत कोकिला! मुबारक तुम्हें जन्मदिन तुम्हारा।
    कहां थकतीं देश प्रेम का अलख जगाने चलीं थी
    बहुभाषी, मनमोहनी , वाणी से सोते हृदय झकझोङती थी
    सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर, कर्त्तव्य पर सब चल पङे थे
    जेल जाने या भूखे रहने की वाली सब संग उनके खङे थे
    संकटों से जूझती, धीर वीरांगना की भांति
    हिन्द के कण-कण में बसा है समर्पण तुम्हारा
    हे भारत कोकिला! मुबारक हो जन्मदिन तुम्हारा।
    कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्ष बनकर कानपुर में गरिमा बढ़ाई
    कभी भारत की प्रतिनिधि बन, दक्षिण अफ्रीका तक जाके आई
    राज्यपाल पद पर होके सुशोभित राष्ट्रनिर्माण का व्रत लिया था
    पहली महिला इस पद पर विराजित,देश को प्रगति पथ पर अग्रसर किया था
    गांधी की शिष्या एनी की सखि तुम, सबसे ऊंचा
    नाम तुम्हारा
    हे भारत कोकिला! मुबारक हो जन्मदिन तुम्हारा।
    ,,,,, Happy National Women’s Day

  • चुम्बन

    वो भटकता रहा लफ़्ज़ दर लफ़्ज़
    गढ़ने को परिभाषायें प्रेम की,
    रिश्तों की, विश्वास की…!!

    और
    मैंने अंकित कर दिया हर एहसास
    उसके दिल में सिर्फ चूम के
    उसके माथे को…!!

    ‘दरअसल चुम्बन, आलिंगन और प्रेमल
    स्पर्श मानव को सृष्टि द्वारा प्रदत्त
    सर्वश्रेष्ठ भाषाएँ है..!!’

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (13/02/2021)

  • यह कौन लोग का हुजूम है?

    भारत की राजधानी दिल्ली के बॉर्डर सिंघु और टिकरी में यह कौन लोग का हुजूम है?
    देखो देखो यह लोग और कोई नहीं
    हमारे देश के अन्नदाता
    जो रोज मेहनत की पसीना बहाकर
    औरों का पेट भरने का प्रयास करने वाले
    हमारे देश की शान सैनिक किसान
    सैनिक किसान सड़क में क्यों?
    जो दूसरों का पेट की चिंता करने वाला
    खून पसीना एक करके फसल उगाने की लड़ाई में
    सैनिक की तरह लड़ने वाला
    इज्जत की ताज सर पे होनी चाहिए जिनके
    वह आखिर सड़क में क्यों?
    यह सड़क का हुजूम सिर्फ हुजूम नहीं है
    सत्ता के लिए एक चेतावनी है ।
    जब-जब निहत्थे पर अन्याय जुल्म बार-बार होगी
    तब निहत्थे जनता भूल जाएंगे उनकी गोला बारूद
    सत्ता पर बार-बार सवाल उठ खड़ी होगी।
    इतिहास फिर से लिखी जाएगी
    सुकरात के जैसे अंधे व्यक्ति का चौराहे पर किया जाने वाला सवाल से सत्ता कांप उठती थी।
    यह देश के शान किसान के समूह का जुलूस प्रदर्शन से सत्ता की नींव हिल कर रह जाएगी।
    फिर से इतिहास का निर्माण होगा
    इतिहास लिखी जाएगी किसानों के खून से।।

  • थकान

    ●थकान
     ̄ ̄ ̄ ̄
    किसान के पास
    फ़सल की बोरियां भरते वक्त
    बोरियां भर थकान भी होती है….

    लेकिन
    वह नहीं भरता
    थकान की बोरियां….

    क्योंकि-
    वह जानता है थकान खरीद सके
    उतना दम नहीं फ़सल खरीदने वालों में…!

    (रमेश धोरावत)
    •••••••••••••••

  • ये तो वही किसान है

    चिड़ियों के चहचहाने से पहले,
    बैलो के रंभाने से पहले जो जाग जाता है,
    ये तो वही मेहनत का पुजारी किसान है|
    अन्न को उपजाने में जिसकी दिन-रात बहती लहू और जिसकी लगती जान है,
    ये तो वही किसान है |

    अन्नदाता ही अन्न को आज मोहताज है,
    जिसके भरोसे कितनों के चुल्हों में आग सुलगते है,
    और जिसके कारण आज दंभ भरते बड़े साहूकार है ,
    ये तो वही मेहनतकस किसान हैं|

    कर्ज,तकलीफ और बेरोजगारी ही आज किसान की किस्मत बनी है,
    घुट-घुट कर जी रहे किसानों की अब हिम्मत भी टूटने लगी है |
    अब आत्महत्या करना ही उनकें बस की बात रहीं है,
    ना जाने कब किसानों की तरक्की होगी,
    उनके बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी होगी |
    ना जाने कब किसानों के चेहरे पर मुस्कान होगी,
    ना जाने कब किसानो की किस्मत धनवान होगी |
    मेहनत ही जिसका ईमान है,
    ये तो वही किसान है |

    सरकारें बनती और गिरती है,
    पर किसानों की तकदीर कहाँ संवरती है |
    कर्ज में डूबा किसान अपनी किस्मत बदलने के लिए आंदोलन कर रहा है,
    अपने हक के लिए सड़को पर ठंड मे मर रहा है |
    परेशानी जिसके हाथों की लकीरें बनी है,
    ये तो वही मेहनत करने वाला किसान है |

    हाथ जोड़े जिसका सर झुका है,
    उम्मीद भरी आँखो से जो रोटी को देख रहा है,
    जिसके लिए सरकार की भी बदल गई ईमान है,
    ये तो वही कर्म को ही पूजा समझने वाला किसान है |
    किसान गर आंदोलन कर रहा है,तो क्या बुरा कर रहा है ,
    वो बस अपनी पसीने की कमाई के लिए दिन-रात लड़ रहा है ,
    पर उसकी किस्मत कहाँ बदल रहा है |
    सोचो गर किसान ना होते तो हमारा क्या होता,
    तो हलक के नीचे इतनी स्वादिष्ट एक निवाला भी नही होता है |
    फिर भी समझ नही आता कि हम किसानों की सता को क्यूँ नकारते है ,
    हमारे खेतों में हरियाली भूमिपुत्र किसान भाई से है, ये बात हम क्यूँ नहीं स्वीकारते है |

    आज फिर से ‘जय जवान,जय किसान का नारा
    लगाना होगा,
    किसानों का सस्ममान वजूद लौटाना होगा |
    किसान भाई! टैक्टर रैली कोई सामाधान नही है ,
    मिटा दे कोई आपका वजूद बना आजतक कोई
    संविधान नहीं है |
    किसान भाईयों को ये समझाना होगा कि वे आंदोलन ना करे,
    अपने आपको बदनाम ना करे |
    अब वो समय आ गया है जब आपकी भी किस्मत चमकेगी |
    गांवो में दूध की नदियाँ तथा खेतों में हरियाली
    बिखरेगीं |
    ये तो वही किसान है जिसकी कभी बिकती नही ईमान है |

  • आदमी का आदमी होना बड़ा दुश्वार है

    सत्य का पालन करना श्रेयकर है। घमंडी होना, गुस्सा करना, दूसरे को नीचा दिखाना , ईर्ष्या करना आदि को निंदनीय माना  गया है। जबकि चापलूसी करना , आत्मप्रशंसा में मुग्ध रहना आदि को घृणित कहा जाता है। लेकिन जीवन में इन आदर्शों का पालन कितने लोग कर पाते हैं? कितने लोग ईमानदार, शांत, मृदुभाषी और विनम्र रह पाते हैं।  कितने लोग इंसान रह पाते हैं? बड़ा मुश्किल होता है , आदमी का आदमी बने रहना।

    रोज उठकर सबेरे पेट के जुगाड़ में, 
    क्या न क्या करता रहा है आदमी बाजार में।
    सच का दमन पकड़ के घर से निकलता है जो,
    झूठ की परिभाषाओं से गश खा जाता है वो।

    औरों की बातें है झूठी औरों की बातों में खोट,
    और मिलने पे सड़क पे छोड़े ना दस का भी नोट।
    तो डोलते हुए जगत में डोलता इंसान है,
    डिग रहा है आदमी कि डिग रहा ईमान हैं।

    झूठ के बाज़ार में हैं  खुद हीं ललचाए हुए,
    रूह में चाहत बड़ी है आग लहकाए हुए।
    तो तन बदन में आग लेके चल रहा है आदमी,
    आरजू की ख़ाक में भी जल रहा है आदमी।

    टूटती हैं हसरतें जब रुठतें जब ख्वाब हैं,
    आदमी में कुछ बचा जो  लुटती अज़ाब हैं।
    इन दिक्कतों मुसीबतों में आदमी बन चाख हैं,
    तिस पे ऐसी वैसी कैसी आदतें गुस्ताख़ है।

    उलझनों में खुद उलझती ऐसी वैसी आदतें,
    आदतों पे खुद हैं रोती कैसी कैसी आदतें।
    जाने कैसी आदतों से अक्सर हीं लाचार है,
    आदमी का आदमी होना बड़ा दुश्वार है।

    अजय अमिताभ सुमन

  • रिश्ते क्षितिज की तरह

    रिश्ते क्षितिज की तरह
    मिले से प्रतीत होते हैं
    बंधन में बंधे लोग कब
    इक दूजे करीब होते हैं

    आकर्षण करीब लाता है
    विकर्षण भी खूब भाता है
    पास में टकराव है लेकिन
    दूरी से ही सच नजर आता है

    लम्बी सी कतार है लेकिन
    इक तरफ झुकाव है लेकिन
    आगे को ही स्नेह बरसता है
    पीछे वाला अक्सर तरसता है

  • आलिंगन

    सांसारिक कुचक्रों में उलझ कर
    अपनी मौलिकता से समझौता
    करते मानव सुनो..!!
    अपने भीतर हमेशा बचा कर रखना
    इतना सा प्रेम…!!
    कि
    जब भी कोई व्यथित हृदय तुम्हारा
    आलिंगन करे तो उस प्रेम की
    ऊष्मा से पिघलकर आँसू बन
    बह उठे उसके मन में जमी
    पीड़ाओं की बर्फ…!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (12/02/2021)

  • जग में जब छा गया प्रकाश

    कोई सो रहा हो,
    शयन कक्ष में अंधकार भी हो रहा हो,
    सूर्य की किरणें आएंगी,
    आ कर उसे जगाएंगी
    ऐसा वह सोच रहा हो
    किंतु यदि उसी ने,
    किरणों के प्रवेश का,
    बंद कर दिया हो द्वार
    तो किरणें कैसे जाएंगी उस पार
    कौन उसे जगा पाएगा
    कौन उसे बता पाएगा,
    कि दिनकर तो कब के आ चुके
    अपनी रौशनी फैला चुके,
    जग में छा गया प्रकाश भी,
    उसे उठाने का किया प्रयास भी,
    किंतु जो जगना ही न चाहे,
    उसे यह जग कैसे जगाए।
    _____✍️गीता

  • वचन

    यदि बाँधने जा रहे हो किसी को
    वचनों की डोर से, तो इतना
    स्मरण रखना

    कहीं झोंक न दे वचन तुम्हारा
    उसे उम्र भर की अनन्त
    प्रतीक्षा में…

    क्योकि,
    प्रतीक्षा वह अग्नि है जो भस्म कर
    देती है स्वप्नों और उम्मीदों के
    साथ-साथ मनुष्य की
    आत्मा को भी…!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • किसान

    खेतों के सब बीज शज़र हो जाते हैं
    सरहद पर वीर अमर हो जाते हैं
    तुम वर्दी पहने मिट्टी साने क्या बतलाते हो
    हम भी इनके जैसे हैं ये दिखलाते हो,

    सीखो जरा लाल अटल और बल्लभ से
    क्या होते हैं वीर-किसान देश नगर के
    अब उनको तुम गोली मारो या फासी लगवा दो
    कर्ज़ से इक़ है मरने वाला एक तुम्हारी यारी से,

    ये भारी है सर्द रात मगर इस दिल्ली की
    तान खड़े है सम्मुख किसान-जवान
    कर रहै है सत्ताधारी न रहे कोई जवान किसान
    फिर कर रहे भारी नुकसान इस दिल्ली की,

    माना के इक़ नशा है सत्ता पर रहने का
    पर ऐसा न करो शोषण जनता के लोगों का
    तुम रखो ये देश संभाले रखो
    पर मत बेचो ये देश जनता के लोगों का,

    तुम किस चेतन के अचेतन पर अटके हो
    तुम कहो नही तुम उसे अन्तर्मन में रहने दो
    देश की सारी संपत्ति को लेकर आए
    तुम उस सम्पति का व्योरा खैर छोड़ो रहने दो,

    क्या कहते हो “बापू” के सपने को पूरा करने
    तुम अपने बात पर कब तक रहते हो रहने दो
    अबकी बार….सरकार का उदघोष अटल है
    कुछ करो अटल बल्लभ से काम,खैर रहने दो।

    तुमको क्या सियासत की रोजगारी है
    हम जैसे वनवासी को नौकरी की आस जारी है
    ऐसे भी अत्याचार कौन करता है बदर’
    अपना भी कहता है और तीर ज़िगर के पार भी करता है।

    -कुमार किशन_बदर

  • आंदोलन

    भूमिपुत्र किसान भाई, तुम जिद्द अपनी छोड़ दो
    धरना प्रदर्शन की दिशा भी घर की तरफ मोड़ दो
    देश पर मण्डरा रहे ख़तरे को गम्भीरता से भांप लो
    तुम्हारी आड़ में मचा आतंक अब तुम पहचान लो

    किसान भाई कोई शक नहीं, व्यथा तुम्हारी सच्ची है
    आंदोलन तुम्हरा हाईजेक हुआ खबर ये भी पक्की है
    तुम किसान भोले भाले, दुश्मन चंट और चालाक है
    देश के अंदर और बाहर, हर तरफ गम्भीर हालात हैं

    रंगे सियार जैसे दुश्मन अंधेरा हर ओर तलाश रहे
    भटके हुए नौजवानों को, बहुरुपिया बन तराश रहे
    तुम्हारे आंदोलन में अपनाबन, विश्वासघात कर रहे
    आंदोलन की आड़ में द्रोही, घातक घात लगा रहे

    ठहरो, सोचो, समझो ट्रेक्टर रैली का प्लान तुम्हरा था
    गणतंत्र दिवस पर शक्ति प्रदर्शन का सिर्फ इरादा था
    फिर लालकिले पर द्रोह, झण्डा किसने फहराया था
    सुरक्षाकर्मियों को मार, तुम्हें बदनाम क्यों करवाया था

    एक बात और समझो, किसान गांव, खेत में होता है
    ज़मीन खोदना, बीज बोना, पानी भी चलाना होता है
    कड़ी धूप, सर्द रातें उधारी, मफलूसी में घर चलाता है
    फिर आंदोलन के नाम पर कौन इतना पैसा बहाता है

    बंद करो अब आंदोलन खुद को मत बदनाम करो
    कौन माचिस दिखा रहा, उसकी तुम पहचान करो
    आज समझौता कर देश संविधान का सम्मान करो
    आंदोलन से क्या खोया, क्या पाया गहनजांच करो

    जय किसान, जय जवान, जय जय जय हिन्दुस्तान

    राकेश सक्सेना
    3 बी 14, विकास नगर, बून्दी (राजस्थान)
    मोबाइल 9928305806

  • गीत – जान ए जिगर |

    गीत – जान ए जिगर |
    तेरी नजर का करम मुझपर अगर हो जाये |
    मिल जाये साथ तेरा आसान सफर हो जाये |
    लहराकर तेरी जुलफ़े हवाओ जब बलखाती है|
    सच कहूँ बिन मौसम सावन असर हो जाये |
    तेरे नजरो का तीर दिल पर जब लगते है |
    मेरे सनम अब मेरी जान पर कहर हो जाए |
    देख तेरे होठो की मुस्कान घायल हम हुये |
    तुम नगमो के गीत हर लब्ज बहर हो जाये |
    तेरी कातिल अदाए गिराती दिल पर बीजलियाँ |
    चलो न चाल मचल जख्मी शहर हो जाये |
    आया है झूम के हुशनों शबाब तुझपर बहुत |
    दीवाना कही तेरा हर गाँव न नगर हो जाये |
    मल्लिकाए हुश्न कहूँ या अफ़सराए जन्नत तुझे |
    हो जाऊं जान निसार गर मुझपर नजर हो जाये |
    गोरा रंग कातिल काला तिल भी तेरा कातिल |
    झूम आओ बांहों तू मेरी जाने जिगर हो जाये |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

  • अन्नदाता

    खेतों से निकल कर सड़को पर क्यों उतर आना पड़ा,
    लाल किले पर उत्तेजित हो क्यों झण्डा लहराना पड़ा।।

    लेकर ट्रेक्टर रैली में बढ़ चढ़के क्यों डण्डा खाना पड़ा,
    रस्ते पर लगा टेण्ट रातों में आखिर क्यों सो जाना पड़ा॥

    अन्न उगाने वालों को आखिर भरभर के क्यों ताना पड़ा,
    अपनी ज़मीन को लेकर सरकारों से क्यों टकराना पड़ा।

    कमी कहाँ थी संसद में जो बिल किसान बनवाना पड़ा,
    मुश्किल हुआ जवाब नहीं तो क्यों पल्ला छुड़ाना पड़ा।

    राही अंजाना

  • इंसान तेरे रूप अनेक

    इंसान तेरे रूप अनेक
    कोई ईमानदारी का प्रतीक
    कोई बेमानी की मिसाल,
    कोई जलता दीपक मंद करता है
    कोई जलाता है मशाल,
    कोई शांति का प्रतीक
    कोई करता है बवाल
    कोई बेशर्मी की हद पार करता है
    कोई रखता है मुंह में रुमाल।
    कोई निष्क्रिय रहता है
    कोई करता है कमाल।
    कोई खुद का ही पेट भरता है
    कोई जरूरत मंद के लिए सजाता है थाल,
    कोई कर्म से परिचय देता है
    कोई बजाता है गाल।
    कोई दूसरों के लिए
    मार्ग खोलता है
    कोई दूसरों के लिए
    रचाता है भंवरजाल।
    इंसान तेरे रूप अनेक
    कभी सहेजता रिश्तों को
    कभी देता है फेंक।

  • तुम्हारा बहुत-बहुत आभार ज़िन्दगी

    तुमने जो किया सब भला ही किया,
    तुमने जो दिया सब भला ही दिया।
    आरम्भ भी तुम्हीं से और अन्त भी तुम्हीं तक,
    तुम्हारा बहुत-बहुत आभार ज़िन्दगी ।
    बिखरते ही जा रहे थे, एक माला के मनके
    ठहराव सा पा गए हैं,जज़्बात मेरे मन के।
    तुमने मुझे मुस्कुराना सिखाया ज़िन्दगी,
    कभी कठिन समय भी दिखाया ज़िन्दगी।
    मेरा हाथ थामें चलती रही सदा तुम,
    कभी जीत मिली,
    कभी मिली हार ज़िन्दगी।
    हर पल है तुम्हारा आभार ज़िन्दगी
    जो पल मिले नाकामियों से,
    वो पल बने,अनुभव ज़िन्दगी।
    जो पल मिले तुमसे हसीं,
    वह पल दिल में छुपा लिए हैं कहीं।
    तुमने मुझे थामा है जिस प्रकार ज़िन्दगी,
    उसके लिए तुम्हारा आभार ज़िन्दगी।
    तुमसे जो मिला न उससे कुछ गिला,
    कभी मन बुझा तो कभी मन खिला।
    यह तो है ज़िन्दगी भर का सिलसिला
    करते रहना यूं ही हमें प्यार ज़िन्दगी,
    तुम्हारा बहुत-बहुत आभार जिंदगी।
    _____✍️गीता

  • मगर है चाँद सा

    आप खो गए थे
    मन उद्वेलित था
    अब आ गए हो
    है प्रफुल्लित सा।
    नभ में सूरज उदित सा,
    मन है मुदित सा।
    आपका होना
    रात को चाँद सा,
    काजल लगी आंख सा।
    मगर प्रविष्टि है कठिन दिल में
    क्योंकि वो बना है
    शेर की माँद सा।
    मगर है चाँद सा।

  • यह कैसी विपदा आई है

    उत्तराखंड की ऋषि गंगा में,
    ढह गया एक हिम-खंड।
    कुछ ही पलों में गिरी हिम-शिला,
    और नदिया उफन गई,
    ढह गए और बह गए,
    उस नदिया में घर कई।
    एक सुरंग में काम कर रहे,
    श्रमिकों पर टूटा कहर।
    करुण क्रंदन और त्राहि-त्राहि की,
    आ गई थी एक लहर।
    किसी ने अपना बेटा खोया,
    किसी का बिछुड़ा भाई है।
    एक बुजुर्ग सी दादी गिरकर,
    लहरों में समाई है।
    रो पड़े परिजन जिन्होंने,
    यह आंखों देखी सुनाई है।
    हे प्रभु बचाले उन लोगों को,
    यह कैसी विपदा आई है ।।
    ____✍️गीता

  • मीठी वाणी बोलिए

    वाणी से ही विष बहे,
    और वाणी से ही,बहे सुधा-रस धार।
    मीठी वाणी बोलिए,
    यही जीवन का सार।
    कण-कण में ईश्वर बसते,
    यही प्रकृति का आधार।
    निज वाणी से मनुज,
    न करना किसी पर प्रहार।
    घाव हो तलवार का,
    एक दिन जाए सूख।
    घाव हरा ही रह जाता है,
    जो वाणी दे जाए।
    सोच समझ कर बोल रे बंदे
    वरना अपने जाएंगे रुठ।।
    _____✍️गीता

  • रिक्तता

    निकाल कर फेंक दिया है मैने
    अपने भीतर से
    हर अनुराग, हर संताप…
    अब न ही कोई अपेक्षा है बाक़ी
    औऱ न ही कोई पश्चाताप..!!

    मैं मुक्त कर चुकी हूँ स्वप्न पखेरुओं
    को आँखो की कैद से…
    वो उड़ चुके हैं अपने साथ लेकर मेरे
    हृदय के सारे विषादों को..

    अब मेरे अंतस में है एक अर्थपूर्ण
    मौन और रिक्तता..
    रिक्तता जो स्वयं में है परिपूर्ण
    जो पूरित है सुखद वर्तमान से…!!

    वर्तमान,जो स्वतंत्र है विगत की परछाइयों से
    जो भयमुक्त है भविष्य की आशंकाओं से
    जो आच्छादित है असीम संतोष से…!!

    संतोष,जिसके मूल में है एक स्वीकारोत्ति
    “मेरी हर तलाश का अंत मुझमें निहित है।”

    ©अनु उर्मिल’अनुवाद’

  • ‘सच’ बस तु हौले से चल…

    वो पलकों की सजावट से,
    वो गलतियों की बिछावट से,
    दिखावटी फिसलन की दौड़ में….
    मैं नदी से हौसला भर लाऊंगा,
    ‘सच’ बस तु हौले से चल…
    मैं पगडंडी से दूर निकल जाऊंगा||

    ऐ जिंदगी तु बतला तो सही,
    प्रीत का कितना है फासला???
    हो रही जो झूठ की बौछारें,
    कितना है नम अब रास्ता,
    आत्मविश्वास का छाता लिए…
    मैं अपनापन सहज लाऊंगा,
    ‘सच’ बस तु हौले से चल…
    एक दिन मैं मंजिल पर पहुँच जाऊंगा||

    अंधेरा घना जो अब छा रहा…
    कदम भी थोड़ा डगमगा रहा,
    ऐ गति, कुछ पल तु ठहर जरा,
    गम की इन मावस रातों में…
    मैं एकादशी का चांद बन जाऊंगा,
    जिंदगी भी पलकें उठा देखेगी…
    जब मैं आसमां से मुस्कराऊंगा,
    ‘सच’ बस तु हौले से चल…
    मैं रोज प्रभात भी जगमगाऊंगा ||

    गर्वित नाम की खोज मे…
    काम के थकाऊं बोझ मे,
    स्मरण है वो माँ का चेहरा…
    है वादा इस भागदौड़ मे,
    मैं लोटकर भी जरुर आऊंगा…
    ‘सच’ बस तु हौले से चल…
    मैं खुशी का घर भी बनाऊंगा||
    – सचिन सनसनवाल ©

  • *हमें आजकल फुर्सत नहीं है*

    आजकल चाय कॉफी का है सहारा,
    इसके बिना दिन कटे ना हमारा।
    हमें सिर उठाने की भी फुर्सत नहीं है,
    कभी कॉपी जांचो कभी प्रश्नपत्र बनाओ,
    कोई छात्र विद्यालय न आए तो उसको मनाओ।
    करके दूरभाष पर बात मात-पिता से,
    विद्यालय आने के लिए समझाओ।
    उंगलियों में कलम है हाथों में है कागज़ भी,
    हाय! कविता लिखने की हम को फुर्सत नहीं है।
    छात्रों की आजकल बस कॉपियां जांचते हैं,
    थोड़े-थोड़े उनको नंबर भी बांटते हैं।
    कितनी मिस कॉल हैं मोबाइल में देखो,
    आजकल बात करने की हम को फुर्सत नहीं है।
    ऑनलाइन कक्षाओं में पढ़ाते थे जब हम,
    सुकून के कुछ पल तो पाते थे तब हम।
    बच्चों ने सिर इस कदर है दुखाया,
    कि हमें सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है।
    _____✍️गीता

  • रसोई घर में खलबली

    आज कल रसोई घर में खलबली सी मच रही है
    चाय और काफ़ी रहती थी सगी बहनों सी
    ग्रीन टी आकर सौतन सी अकड़ रही है
    आज कल रसोई घर में खलबली सी मच रही है

    दूध,दही,छाछ की बहा करती थी नदियां
    स्मूदी,माॅकटेल रंगीन बोतलों में बंद रंग जमा रही है
    आज कल रसोई घर में खलबली सी मच रही है

    मक्खन और घी से महकता था आंगन
    चीज़ और म्योनीज चिकनी चुपड़ी बातें कर भरमा रही है
    आज कल रसोई घर में खलबली सी मच रही है

    दाल,रोटी सब्जी,चावल,पापड़ अचार से सजती थी थाली
    पिज्जा, बर्गर, चाइनीज थाली से छेड़खानी कर रही है
    चम्मच और छुरी-कांटे में थोड़ी तनातनी चल रही है
    आज कल रसोई घर में खलबली सी मच रही हैं।

  • राम, राम, राम तु रटते जा

    राम, राम, राम तु रटते जा
    मन से मन की विकार तु हटाये जा
    राम से ही जन्मों का पाप धुलता
    राम से ही राम मिलता
    राम, राम, राम तु रटते जा
    मन से मन की विकार तु हटाये जा ।।1।।
    ————————————————
    राम ही लगाते हैं, सभी का बेड़ा पार
    तेरा भी साथ देंगे रघुनाथ
    राम, राम तु नित-दिन सुमिरता जा
    कौशल्यानंदन का नाम तु हृदय से गाते जा
    राम, राम, राम तु रटते जा
    मन से मन की विकार तु हटाये जा ।।2।।
    —————————————————–
    भला-बुरा का फर्क जानना हैं बड़ा कठिन
    ये दुनिया क्या है?, राम ही जाने सब-कुछ
    तु राम, राम, राम जानके सब-कुछ राम को अर्पण करता जा
    एक दिन राम तुम्हें देंगे दरश,
    ये बात मन ही मन में तु याद करता जा
    राम, राम, राम तु रटते जा
    मन से मन की विकार तु हटाये जा ।।3।।
    ——————————————————————
    कवि विकास कुमार

  • एक युद्ध..

    जब आंख से एक आंसू छलका,
    हो गया मन कुछ हल्का-हल्का।
    निकल गया था कुछ रुका-रुका सा,
    एक गुबार बीते कल का।
    वजन था आंसुओं में भी,
    कभी सोचा नहीं था ये
    संयम रखते रखते,
    ना जाने कब आंख में आंसू आए।
    अंतर्मन में आरंभ हो गया
    एक युद्ध…..
    अपने ही विरुद्ध ।।
    _____✍️गीता

  • कभी मीठा कभी खट्टा

    कभी धूप सुहाती है
    कभी भाती है छाया,
    कभी विरक्ति आती है
    कभी लुभाती है माया।
    कभी मीठा कभी खट्टा
    कभी कड़वा कसैला,
    बदलते स्वाद भाते हैं
    अलग से ख्वाब आते हैं।
    समय अस्थिर, न कुछ स्थिर
    न मैं स्थिर न तुम स्थिर
    धरा भी घूमती रहती
    सांस तक है पलक अस्थिर।
    नजर जब दूर तक डाली
    अंधेरा था उजाला था
    सभी प्रकृति का सृजन
    सभी उसका निवाला था।
    आज जो पात गिरते हैं
    वही तो खाद बनते हैं,
    गिरे पत्ते बने माटी से
    पौधे स्वाद लेते हैं।
    चला है चक्र सृजन का
    चला है चक्र मिटने का,
    सभी अस्थिर नहीं फिर भी
    किसी भान को झुकने का।

  • अभी कुछ दिन और

    विद्यालयों में रौनक लग गई,
    देखो फ़िर से कक्षाएं लग गई।
    फ़िर से बच्चों का है शोर,
    प्री बोर्ड का अब है जोर।
    बच्चों मास्क लगाकर आओ,
    शिक्षा संग सेहत भी पाओ।
    मिल-जुल कर रहो हम ही कहते थे,
    लेकिन बीता अब वो दौर।
    दूर-दूर सब की सीट लगी है,
    एक ओर नीतू बैठी है,मेघा बैठी है दूजे छोर।
    बीतेगा एक दिन यह भी दौर।
    आएगी फ़िर से नई एक भोर,
    मास्क लगाकर दूरी बनाकर,
    बैठो अभी कुछ दिन और।
    _____✍️गीता

  • गाँधी

    ⏱गाँधी⏱
    ****************

    ये गाँधी की धरती है,
    राम रहमान भी बसते है,

    साफ नियत बनते है,
    ये गाँधी के चश्मे से,

    हाथ थामे जो डंडे को,
    नेक पथ पर ओ चलते है,

    ओढ़े जो खादी को,
    सत्य अहिंसा बात बोलते है,

    कमर में लटके घड़ी जो,
    समय की पाबंद बनते है,

    हाथ मे रखे गीता ओ,
    समरसता की पाठ पढ़ाते है,

    तेरे ये तीन बंदर जो,
    न कह न सुन न देख बुराई को,

    ये इसको अपनाता है,
    गाँधी के पथ पर चलता है,

    ये फकीरी तेरे जीवन तो,
    स्वच्छता की राह बताते है,

    आज गाँधी की जरूरत है,
    फैले भ्रष्टाचार मिटाने को,

    ये गाँधी की धरती है,
    राम रहमान भी बसते,

  • रोकना मत तुम कदम

    लक्ष्य कहता है कि पथ में
    लाख बाधाएं रहेंगी,
    जब व्यथित हो जाओगे
    टूटने वाले ही होगे,
    तब समझना आ गए हो
    पास मेरे,
    सौ निराशा मार्ग घेरें,
    रोकना मत तुम कदम को,
    एक दिन पाओगे मंजिल
    छू रहे अपने कदम को।
    वो करो जो आज तक
    कोई नहीं कर पाया था,
    उसको पाओ आज तक
    कोई नहीं पा पाया था।
    मत रखो डर-भय किसी से
    मार्ग यदि सदमार्ग है,
    तुम चुनो उस राह में जो
    सत्य का ही मार्ग है।

  • साझी साइकिल ले लेते

    खेल चल रहा था बच्चों का
    छोटे छोटे बच्चे थे,
    आपस में वे प्यारी प्यारी
    बातें बोल रहे थे।
    कोई थे धनवान घरों के
    कोई थे धन से कमजोर,
    लेकिन बच्चे सभी बराबर
    बात कर रहे थे दिल खोल,
    एक बोला मेरे पापा
    जन्मदिवस पर लाये हैं
    गियर वाली साइकिल का तोहफा
    सात हजार में लाये हैं,
    दूजी बोली मैं भी जल्दी
    साइकिल लेने वाली हूँ,
    पांच हजार की सुन्दर सी
    मैं साइकिल लेने वाली हूँ,
    सात बरस की एक गुड़िया
    ग्यारह की दीदी से बोली,
    दीदी अगर दस रुपये की भी
    साइकिल आती होती तो
    तुम भी लेती मैं भी लेती,
    इतनी सस्ती आती तो।
    अगर बीस की भी आती तो
    साझी साइकिल ले लेते,
    खूब सवारी करते रहते
    हम भी खूब मजे लेते।

  • तब कवि कहाँ हैं हम

    गलत को यदि गलत बोलें नहीं
    तब कवि कहाँ हैं हम,
    बन्द आंखें कर चलें तब
    कवि कहाँ हैं हम।
    जी हुजूरी में रहे
    आदत कलम की है नहीं
    यदि किसी से दब गए
    तब कवि कहाँ हैं हम।
    झूठ की ताकत भले
    छूने लगे ऊँचा गगन
    साथ सच का छोड़ दें
    तब कवि कहाँ हैं हम।
    खेल हो जब दूसरे की
    भावना से खेलने का
    हम समझ पायें नहीं
    तब कवि कहाँ हैं हम।
    बह रहा हो अश्रुजल
    छल-छल किसी मासूम का
    पोंछ पायें गर नहीं
    तब कवि कहाँ हैं हम।
    छीनता कोई दिखे जब
    हक किसी मासूम का
    रोक पायें यदि नहीं
    तब कवि कहाँ हैं हम।

  • रात तू अकेली नहीं

    दूर तलक तनहाई का आलम
    अकेली बिरह वेदना सहती
    ख़ामोशी की गहरी चादर ओढ़े
    चुपचाप रहती है रात।
    किसको अपनी पीङ सुनाए
    कैसे उसको अपना मीत बनाए
    जिसके लिए कयी ख्वाब सजाए
    उधेड़-बुन में रोती रात।
    देखो ये कोयल क्यूं ‌ कूके
    तुझसे भी क्या प्रीतम रूठे
    तू भी है विरहा ‌की मारी
    खुद से ही बातें करती रात।

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