हिन्दी-उर्दू कविता

नागरिकता संशोधन अधिनियम के समर्थन में

नागरिकता संशोधन अधिनियम के समर्थन में ————————————— हम वतन थे जो त्रस्त थे बाहर, उनको घर उनके बुलाया तो बुरा क्या किया! बिना टिकट सवार थे भारी टिकट जो पूछी गई ऐसा बुरा क्या किया! सांप बिच्छू सभी रहते थे जहां बिलों में पिघला शीशा डाला तो बुरा क्या किया! दीमकें लगी थी जड़ में खोखला वतन ये किया जड़ों में तेल लगाया तो बुरा क... »

अंदाज

उसके छोडने का अंदाज कुछ ऐसा था मेरे प्यार पर इलज़ाम कुछ ऐसा था ना वजह थी कोई ना बहाना था उसे तो बस मुझे छोडकर जाना था शायद मेरे किसी अपने का वो दीवाना था मैं भी मजबूर थी वक्त के आगे तुम्हारी खुशी के लिए छोड दूंगी तुम्हे उससे किया ये वादा जो निभाना था »

कौन

मेरी कोशिशों को नाकाम करके तुझे क्यो अच्छा लगता है। तेरे जहन मे ये जलन का मुद्दा ही क्यो चलता रहता है।। है हिम्मत गर तुझमे तो तू कदम क्यो न आगे बढाता है। तब देखूं मेरे सिवा तुझे कौन अपना नजर आता है।। »

वीरों का दिल से अभिनन्दन।

वीरों का दिल से अभिनन्दन। सीमा  पर  डटकर  खड़े हुए, दो-नयन  शत्रु  पर  गड़े  हुए, हाथों  में अस्त्र  सुशोभित  है, उर से भय आज तिरोहित है। जन-गण-मन करते  हैं वन्दन, वीरों का दिल से अभिनन्दन। उत्साह  हृदय  में  भरा  हुआ, पग  अंगारों  पर   धरा  हुआ, अरि के हिम्मत को तोड़ चले, तूफा की गति को मोड़  चले। झुकता धरती पर आज गगन, वीरों का दिल से अभिनन्दन। करते   भारत   की   रखवाली, हत, जिसने बुरी नजर  डाली,... »

कौन हूं मैं?

कौन हूं मैं? ————- बिजलियां, आंधियां कोंधती उड़ती रहीं। धारियां, छुरियां दिल पे निशा देती रहीं। अठखेलियां, रंगरेलियां आवारगी करती रहीं। विरक्तिया,सिसकियां गम और ख़ुशी भरती रहीं। रीतियां, बेड़ियां बंदिशे देती रहीं। गलबहियां, कनअखियां सुकुन है कहती रहीं। इश्क़ में कुछ तो बात थी कचहरीयां होने लगी मुश्क सा वो फैल गया हर गली चर्चा होने लगी। दिल की लगी भी थी क्या लगी सदियों तलक स... »

आयत

मेरी आयत है तू जितना पढ़ू उतना खो जाता हूँ काश इतनी सिद्दत से पढ़ा होता तोह अव्वल आ जाते »

मेरा श्रृंगार तुमसे

दर्पण के सामने खड़ी होकर, जब भी खुद को सँवारती हूँ उस दर्पण में तुमको साथ देख,अचरज में पड़ जाती हूँ शरमाकर कजरारी नज़रें नीचे झुक जाती हैं पर कनखियों से तुमको ही देखा करती हैं यूं आँखों ही आँखों में पूछ लेती है इशारों में बताओ कैसी लग रही हूँ इस बिंदिया के सितारों में मेरी टेढ़ी बिंदी सीधी कर तुम जब अपना प्यार जताते हो उस पल तुम अपने स्पर्श से, मुझसे मुझको चुरा ले जाते हो ये पायल चूड़ी झुमके कंगन सब दे... »

शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है

शक्ति संपन्न की जनक दुलारी जब तुमने लांछन लगाया था चाहती प्रलय वो ला सकती थी धरती की गोद में सो जाती है शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है धरती पर एक कण बचता जो काली शांत ना होती तो अर्धांग की छाती पैर धारा फिर दुख संताप में खो जाती है शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है जब क्रोध में नारी रोए तो घर में महाभारत हो जाती है अपने परिवार में शांति रहे आंसू से क्रोध को धो जाती है शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है जाने कितनी... »

शिवांशी

मैं शिवांशी , जल की धार बन शांत , निश्चल और धवल सी शिव जटाओं से बह चली हूँ अपने मार्ग खुद ढूँढती और बनाती आत्मबल से भरपूर खुद अपना ही साथ लिए बह चली हूँ कभी किसी कमंडल में पूजन को ठहर गई हूँ कभी नदिया बन किसी सागर में विलय हो चली हूँ जिस पात्र में रखा उसके ही रूप में ढल गई हूँ तुम सिर्फ मेरा मान बनाये रखना, बस इतनी सी इच्छा लिए तुम्हारे संग बह चली हूँ मुझे हाथ में लेकर जो वचन लिए तुमने उन वचनों को... »

तू

तू आया तो बसन्त है….। तू गया तो बस अन्त है।। »

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