हिन्दी-उर्दू कविता

स्नेह की संजीवनी

जब हर ओर निराशा हो, आशा की किरण दिखा देना। जब राहों में हो घोर निशा, दीपक बन कोई राह दिखा देना। कोई साथ दे ना दे, तुम अपना हाथ बढ़ा देना। दर्द में जब कोई तड़प रहा हो, स्नेह की संजीवनी पिला देना। बनकर पथ प्रदर्शक किसी का, उसके जीवन में उल्लास जगा देना।। _____✍️गीता »

लालच वृद्धि करता प्रति पल

जंगल का दोहन कर डाला, इन्सान तेरे लालच ने। कुदरत के बनाए पशु-पक्षी भी ना छोड़े, इन्सान तेरे लालच ने। हाथी के दांत तोड़े, मयूर के पंख न छोड़े मासूम से खरगोश की नर्म खाल भी नोच डाली, इन्सान तेरे लालच ने। चंद खनकते सिक्कों की खातिर, यह क्या जुल्म कर डाला। सृष्टि की सुंदरता का अंत ही कर डाला इन्सान तेरे लालच ने। कितना भी मिल जाए फिर भी, लालच वृद्धि करता प्रति पल। सुंदर पक्षी ना शुद्ध पवन कैसा होगा अपन... »

जाने तुम कहां गये

अरमानों से सींच बगिया, जाने तुम कहां गए। अंगुली पकड़ चलना सीखाकर, जाने तुम कहां गए।। सच्चाई के पथ हमको चलाकर, जाने तुम कहां गए। हमारे दिलों में घर बनाकर, जाने तुम कहां गए।। तुम क्या जानो क्या क्या बीती, तुम्हारे बनाए उसूलों पर।। वृद्धाश्रम में मां को छोड़ा, बेमेल विवाह मेरा कराया। छोटे की पढ़ाई छुड़ाकर, फैक्ट्री का मजदूर बनाया।। पुश्तेनी अपना मकान बेच, अपना बंगला बना लिया। किस्मत हमारी फूटी निकली,... »

क्या पता ..

किस मोड़ पर मंज़िल कर रही है इन्तज़ार, क्या पता … किस राह में हो जाए दीदार-ए यार क्या पता… जीत एक रास्ता है, हार एक अनुभव है जीवन का। कल क्या हो, किसी को क्या पता… ____✍️गीता »

वह एक मज़दूर है

भवन बनाए आलीशान, फ़िर भी उसके रहने को नहीं है उसका एक मकान। झोपड़पट्टी में रहने को मजबूर है हाँ, वह एक मज़दूर है। मेहनत करता है दिन रात, फ़िर भी खाली उसके हाथ। रूखी- सूखी खाकर वह तो, रोज काम पर जाता है। किसी और का सदन बनाता, निज घर से वह दूर है, हाँ, वह एक मज़दूर है। सर्दी गर्मी या बरसात, चलते रहते उसके हाथ। जीवन उसका बहुत कठिन है, कहता है किस्मत उसकी क्रूर है। हाँ, वह एक मज़दूर है।। _____✍️गीता »

कविता : समय का पहिया

मानो तो मोती ,अनमोल है समय नहीं तो मिट्टी के मोल है समय कभी पाषाण सी कठोरता सा है समय कभी एकान्त नीरसता सा है समय समय किसी को नहीं छोड़ता किसी के आंसुओं से नहीं पिघलता समय का पहिया चलता है चरैवेति क्रम कहता है स्वर्ण महल में रहने वाले तेरा मरघट से नाता है सारे ठौर ठिकाने तजकर मानव इसी ठिकाने आता है || भूले से ऐसा ना करना अपनी नजर में गिर जाए पड़ना ये जग सारा बंदी खाना जीव यहाँ आता जाता है विषय ,विला... »

चला चली का मेला

आखिर इक दिन सबको जाना है यह जग चला चली का मेला है यहाँ किसी का नही ठिकाना है फिर किस बात का घबराना है बस इतना सा हमारा अफ़साना है आख़िर इक दिन सबको जाना है ना कुछ संग आया था,ना जाना है कर्मो ने ही अपना फर्ज निभाना है पाप पुण्य की गठरी बांध उड़ जाना है पांच तत्व की काया को मिट्टी हो जाना है आखिर इक दिन सबको जाना है आत्मा को आवागमन से मुक्त कर क्षितिज पार जाना है कुछ प्रतीक्षारत तारों को एक बार गले ... »

भ्रम

हम भ्रम पाल लेते हैं, “मैंने ही उसे बनाया है”, कभी सोचा तूने, भू-मण्डल किसने बसाया है। भाई ये सब कर्मानुसार ही, ब्रह्मा की माया है, कोई सूरमा आज तक, अमर नहीं हो पाया है।। »

सोंच अलग है

सोंच अलग है याददाश्त विलग है अपनी चाहतों के लिए वो आज हमसे अलग हैं लाखों जमा कर दोस्तों ने सारी उम्र की कमाई गवांई शहर की छोटी जमी के लिए वहीं पे सारी सुविधाएं जुटाई सिसकती रही गांव भूमि बेचारी जिन संसाधनों से जिंदगी बनाई कुछ ने बहुत सी फसलें उगाई जमीनें भी ली और बहुत सारी वहीं जहां की खुशबू ने पढ़ाई उन्हें शहर मंजिलो में पहुंचाई करनी पड़ेगी उनकी पर बड़ाई बचपन ने उन्हें यहीं खींच लाई आकर्षण के तार... »

रूपरेखा

ख़ुद पर ऐतवार कर पर भूलकर भी न किसी पर विश्वास कर। खुद के ही बल पर अपने जीवन की रूपरेखा तराश कर।। कब कोई अपना,अपनी अंगुली को घुमा,तोहमत तुझपे लगा देगा तेरी हर जायज़ कोशिश को भी, तेरी ही गलती बना देगा अकेले ही रहने की आदत डाल, न अपनी भावनाओं से खिलवाड़ कर।। देखो कैसी अजब घङी यह आई है, अपनों से ही अपनेपन की लङाई है, न स्वार्थ है फिर भी क्यूं ये खिंचाई है मन है सूना- सूना, पलकें मेरी पथराई हैं ख्वाइश... »

वजूद

लफ़्ज़ों की कमी थी आज शायद या रूह में होने वाले एहसास की 💐💐💐💐💐💐💐💐 नही पता मुझको कहानी तेरी शायद बस इतना जानती हूं कि वजूद को तेरे 💐💐💐💐💐💐💐💐 तूझसे ज्यादा जानती हूं शायद ख्वाबबगाह में जो बसता है वो 💐💐💐💐💐💐💐💐💐 अलग सी खुमारी और कशिश शायद मेरे रोम रोम में बसी है जो 💐💐💐💐💐💐 कैसे बताऊं तुमको क्या रूमानी एहसास है वो कैसे यकीं दिलाऊं कितना रूमानी है वो 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 बिन फरेब कितना मासूम है वो किसी ख्वाबगाह का सरता... »

एक अजन्मी की दास्तान

सुन्दर सपने देख रही थी, अपनी माँ की कोख में। मात-पिता का प्यार मिलेगा, भाई का भी स्नेह मिलेगा यह सब सुख से सोच रही थी, सहसा समझ में आया कि एक कैंची मुझको नोंच रही थी। क्यों कैंची से कटवाया, मुझको मेरी माँ की कोख में। पूछ रही है एक अजन्मी, एक सवाल समाज से। मैं भी ईश्वर का तोहफा थी, क्यों मेरे जीवन का अपमान किया। तुम्हें एक वरदान मिला था, क्यों ना उसका सम्मान किया। अगर मैं जीवित रहती तो, प्रेम से घर... »

माँ

अपनी माँ को छोड़ कर, वृद्धाश्रम के द्वार पर। जैसे ही वो बेटा अपनी कार में आया, माँ के कपड़ों का थैला, उसने वहीं पर पाया। कुछ सोचकर थैला उठाकर, वृद्धाश्रम के द्वार पर आया। बूढ़ा दरबान देख कर बोला, अब क्या लेने आए हो वह बोला बस यह माँ का, थैला देने आया हूं। दरबान ने फ़िर जो कहा उसे, सुन कर वह सह नहीं पाया, धरा निकली थी पैर तले से खड़ा भी रह नहीं पाया। वह रोता जाता था, भीतर बढ़ता जाता था मां सब मेरी ... »

किसानों का किया है इन्हीं ने तो बुरा हाल

आतंकियों के ठिकाने बदल रहे हैं शिकारियों के पैमाने बदल रहें हैं छिप-छिप के करते थे कभी ठगी जो लालच के उनके आशियाने बदल रहे हैं भोले-भाले को ठगना ही जिनका काम चींटियों की तरह बांबियां बनायी सरेआम सब का ही कर रखा है देखो रास्ता जाम इतने निष्ठुर तो नहीं कहीं होते हैं किसान बेईमानों की प्रत्यक्ष है पहली बार मंडली लूट का पता बता रही हैं तन जमी चर्बी नहीं है ये हितकारी न ही कोई किसान फुटपाथ पे ले आई इन्... »

मैं-मैं व तूं तूं

सारे व्यापार को तेरा आधार संबंधों में भी तुझसे ही है प्यार तुझमें ही सब और सबमें प्रकट तूं फिर भी सब में क्यूं भरा मैं मैं व तूं तूं पल पल के मीत जाते बीत प्यार सच्चा पर अंतराल का गीत नीरस जीवन में लाता मधुरता संगीत प्रियतम तेरे आशीष संबंध सुख पाते जीत तुझसे ही बने हैं सारे रूप नेह आगार भरे कितने अनूप सुंदर जो थे कैसे बन जाते कुरूप प्रभु तुझसे ही तो सब की छांव धूप अंत तुम्हीं तुझमें विश्राम तुझमें... »

बेटी

गांव गांव में मारी जाती, बेटी मां की कोख की, बेटी मां की कोख की, बेटी मां की कोख की।। जूही बेटी, चंपा बेटी, चन्द्रमा तक पहुंच गई, मत मारो बेटी को, जो गोल्ड मेडलिस्ट हो गई, बेटी ममता, बेटी सीता, देवी है वो प्यार की। बेटी बिन घर सूना सूना, प्यारी है संसार की, गांव गांव में मारी जाती, बेटी मां की कोख की।। देवी लक्ष्मी, मां भगवती, बहन कस्तूरबा गांधी थी, धूप छांव सी लगती बेटी, दुश्मन तूने जानी थी। कल्प... »

फूलों की महफ़िल

सब फूलों ने मिलकर, महफ़िल एक सजाई। किस की सबसे सुन्दर रंगत, और किस की महक मन भायी। बेला चमेली और मोगरा ने महक कर, वेणी खूब सजाई। गेंदा और गुलाब ने, मन्दिर में धूम मचाई। हरसिंगार के फूलों ने, किया श्री हरि व हरि-प्रिया का श्रृंगार। पुष्प पलाश के लाए सखि, होली के उत्सव की बहार।। ____✍️गीता »

सागर और सरिता

सागर ने सरिता से पूछा, क्यों भाग-भाग कर आती हो। कितने जंगल वन-उपवन, तुम लांघ-लांघ कर आती हो। बस केवल खारा पानी हूं, तुमको भी खारा कर दूं। मीठे जल की तुम मीठी सी सरिता, क्यों लहराती आती हो। नि:शब्द हो उठी सरिता, उत्तर ना था उसके पास, बोली तुम हो कुछ ख़ास। ऐसा हुआ मुझे आभास, विशाल ह्रदय है तुम्हारा। फैली हैं दोनों बाहें देख, हृदय हर्षित होता है। आ जाती हूं पार कर के, कठिन कंटीली राहें।। ____✍️गीता »

‘‘फितरत’’

हे मानव तेरी फितरत निराली, उलट पुलट सब करता है, बंद कमरे में वीडियो बनाकर, जगजाहिर क्यों करता है? शादी पार्टी में खाना खाकर, भरपेट झकास हो जाता है, बाहर आकर उसी खाने की, कमियां सबको गिनाता है जिस मां की छाती से दूध खींच, बालपन में तू पीता है उसी मां को आश्रम में भेजकर, चैन से कैसे तू जीता है बचपन में तू जिद्द करके अपनी, हर बात मनवाता है बुढ़े माॅ-बाप की हर इच्छा को, दरकिनार कर जाता है मां, बहन, बेट... »

भटके हुए रंगों की होली

आज होली जल रही है मानवता के ढेर में। जनमानस भी भड़क रहा नासमझी के फेर में, हरे लाल पीले की अनजानी सी दौड़ है। देश के प्यारे रंगों में न जाने कैसी होड़ है।। रंगों में ही भंग मिली है नशा सभी को हो रहा। हंसी खुशी की होली में अपना अपनों को खो रहा, नशे नशे के नशे में रंगों का खून हो रहा। इसी नशे के नशे में भाईपना भी खो रहा।। रंग, रंग का ही दुश्मन ना जाने कब हो गया। सबका मालिक ऊपरवाला देख नादानी रो गया,... »

बसन्त का आगमन

हवाओं ने मौसम का, रूख़ बदल डाला। बसन्त के आगमन का, हाल सुना डाला। नवल हरित पर्ण झूम-झूम लहराए। रंग-बिरंगे फूलों ने, वन-उपवन महकाए। बेला जूही गुलाब की, सुगंधि से हृदय हर्षित हुआ जाए। कोमल-कोमल नव पर्ण, अपने आगमन से जीवन में ख़ुशहाली का, सुखद संदेशा लाए। बीता अब पतझड़ का मौसम, हृदय प्रफुल्लित हुआ जाए।। _____✍️गीता »

पारिजात के फूल

पारिजात के फूल झरे, तन-मन पाए आराम वहां। स्वर्ग से सीधे आए धरा पर, ऐसी मोहक सुगंधि और कहां। छोटी सी नारंगी डंडी, पंच पंखुड़ी श्वेत रंग की। सूर्य-किरण के प्रथम स्पर्श से, आलिंगन करते वसुधा का। वसुधा पर आ जाती बहार, इतने सुन्दर हैं हरसिंगार। रात की रानी भी इनका नाम, ये औषधीय गुणों की खान। श्री हरि व लक्ष्मी पूजन में होते अर्पण, इनकी सुगन्ध सौभाग्य का दर्पण। कितनी कोमल कितनी सुंदर, इन फूलों की कान्ति... »

वचन

जब कभी भी टूटे ये तंद्रा तुम्हारी, जब लगे कि हैं तुम्हारे हाथ खाली! जब न सूझे ज़िन्दगी में राह तुमको, जब लगे कि छलते आये हो स्वयं को! जब भरोसा उठने लगे संसार से , जब मिलें दुत्कार हर एक द्वार से! जग करे परिहास और कीचड़ उछाले, व्यंग्य के जब बाण सम्भले न सम्भाले! ईश्वर करे जब अनसुना तुम्हारे रुदन को, जब लगे वो बैठा है मूंदे नयन को! न बिखरना, न किसी को दोष देना, मेरे दामन में स्वयं को सौंप देना..!! अपन... »

सूर्य कांत त्रिपाठी निराला

“बदली जो उनकी आंखें इरादा बदल गया। गुल जैसे चमचमाया कि, बुलबुल मसल गया। यह कहने से हवा की छेड़छाड़ थी मगर खिलकर सुगंध से किसी का, दिल बहल गया।” सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की, “बदली जो उनकी आंखें” से ली गई चंद पंक्तियां निराला जी की जन्म २१ फरवरी १८९६ को, हुआ मिदनापुर बंगाल में। हाथ जोड़ शत्-शत् नमन है उनको, २०२१वें साल में। पिता,पंडित राम सहाय त्रिपाठी, माता का नाम था रुक... »

मेरा मन

किसी की सिसकियां सुनती थी अक्सर, कोई दिखाई ना देता था। देखा करती थी इधर-उधर, व्याकुल हो उठती थी मैं, लगता था थोड़ा सा डर। एक दिन मेरा मन मुझसे बोला.. पहचान मुझे मैं ही रोता हूं, अक्सर तेरे नयन भिगोता हूं। मासूमों पर अत्याचार, बुजुर्गों को दुत्कार, वृद्धाश्रमों में बढ़ती भीड़, नारियों की पीड़, इन्हीं से दिल दुखी है दुनिया में क्यों हो रहा है यह व्यवहार। कब समाप्त होगा यह अत्याचार, बस यही सोच-सोच कर... »

शब्द-चित्र

कहती है निशा तुम सो जाओ, मीठे ख्वाबों में खो जाओ। खो जाओ किसी के सपने में, क्या रखा है दिन-रात तड़पने में। मुझे सुलाने की कोशिश में, जागे रात भर तारे। चाँद भी आकर सुला न पाया, वे सब के सब हारे। समझाने आई फिर, मुझको एक छोटी सी बदली मनचाहा मिल पाना, कोई खेल नहीं है पगली। पड़ी रही मैं अलसाई, फ़िर भोर हुई एक सूर्य-किरण आई। छू कर बोली मस्तक मेरा, उठ जाग जगा ले भाग, हुआ है नया सवेरा।। ____✍️गीता »

मातृभाषा

दर्द बनके आँखो के किनारों से बहती है! बनकर दुआ के फूल होंठो से झरती है!! देती है तू सुकून मुझे माँ के आँचल सा! बनके क़भी फुहार सी दिल पे बरसती है!! खुशियाँ ज़ाहिर करने के तरीक़े हज़ार है! मेरे दर्द की गहराई मगर तू समझती है!! जाऊँ कहीं भी मैं इस दुनिया जहान में! बन कर मेरी परछाईं मेरे साथ चलती हैं!! होगी ग़ुलाम दुनिया ये पराई ज़बान की ! मेरी मातृभाषा तू मेरे दिल में धड़कती है!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद&#... »

धरती-पुत्र

मूसलाधार बारिश से जब, बर्बाद हुई फ़सल किसान की बदहाली मत पूछो उसकी, बहुत बुरी हालत है भगवन्, धरती-पुत्र महान की। भ्रष्टाचार खूब फैल रहा, काले धन की भी चिंता है। मगर किसी को क्यों नहीं होती, चिंता खेतों और खलिहान की। अपनी फ़सलों की फ़िक्र लेकर, हल ढूंढने निकला है हलधर लेकिन सबको फ़िक्र लगी है, अपने ही अभिमान की। मूसलाधार बारिश से जब, बर्बाद हुई फ़सल किसान की बदहाली मत पूछो उसकी, बहुत बुरी हालत है भ... »

फुलझडियां

मनचले ने रुपसी पर, तंज कुछ ऐसा गढ़ा, काश जुल्फ़ों की छांव में, पड़ा रहूं मैं सदा। रुपसी ने विग उतार, उसे ही पकड़ा दिया, ले रखले जुल्फ़ों को तू, पड़ा रह सदा सदा।। फेसबुक की दोस्त को, बिन देखे ही दिल दे दिया, जो भी मांगा प्रेयसी ने, आॅनलाईन ही भेज दिया। एकदिन पत्नी के पास वही गिफ्ट देख चौंक गया, उसकी पत्नी ही फ्रेंड थी, बेचारा मूर्छित हो गया।। पत्नी से प्रताड़ित पति ने ईश्वर को ताना दिया, क्या पाप क... »

शिक्षा का महत्व

वह पढ़ना चाहता है जीवन से लड़ना चाहता है। आगे बढ़ना चाहता है किंतु क्या रोक रहा उसको, कोई टोक रहा उसको बाप कहे कुछ कर मजदूरी, ऐसी भी क्या है मजबूरी चंद सिक्कों की खातिर, कौन कर रहा बचपन पर अत्याचार है, शिक्षा तो उसका अधिकार है। कोई इन्हें समझाए, यदि ये बच्चे शिक्षित हो जाएं, तो तुम्हारे ही घर का उद्धार है। देश का भी हित होगा, फिर क्यों इनका अहित हो रहा। मैं समझाती रहती हूं, अक्सर मिलती मुझको हार ह... »

मेहनत के रंग

वो बूढ़ी थी, गरीब थी भीख नहीं मांगी थी उसने, पैन बेच रही थी राहों में मेहनत का खाने की ठानी, मेहनत का ही खाती खाना मेहनत का ही पीती पानी। कहती थी यह पैन नहीं है, यह तो है किस्मत तुम्हारी खूब पढ़ना लिखना बच्चों बदलेगी तकदीर तुम्हारी। बदलेगा फिर भारत सारा, बदलेगी तस्वीर हमारी।। ____✍️गीता »

काँव काँव मत करना कौवे

काँव काँव मत करना कौवे आँगन के पेड़ों में बैठ तेरा झूठ समझता हूं मैं सच में है भीतर तक पैठ। खाली-मूली मुझे ठगाकर इंतज़ार करवाता है, आता कोई नहीं कभी तू बस आंखें भरवाता है। जैसे जैसे दुनिया बदली झूठ लगा बढ़ने-फलने तू भी उसको अपना कर के झूठ लगा मुझसे कहने। रोज सवेरे आस जगाने काँव-काँव करता है तू मुझ जैसों को खूब ठगाने गाँव-गाँव फिरता है तू। अब आगे से खाली ऐसी आस जगाना मत मुझ में तेरी खाली हंसी ठिठोली च... »

मनुष्य हो तुम

मनुष्य हो तुम मनुष्यता सदैव पास रखो पाशविक वृत्तियों को पास आने न दो। दया का भाव रखो प्रेम की चाह रखो ठेस दूँ दूसरे को भाव आने न दो। दया पहचान है कि आप में मनुष्यता है अन्यथा फर्क क्या है फर्क का भान रखो। पेट भर जाये खुद का खूब भरता ही रहे भले औरों को क्षुधा चैन लेने ही न दे, भावना आदमियत की नहीं यह ध्यान रखो, दया धरम ही सच है मन में इसका ज्ञान रखो। »

ITNA ACHACHA YA BURA NAHI HOON

इतना अच्छा या बुरा नहीं हूँ, जितना कि दुनिया कहती है । मैं कैसा हूँ, ये सिर्फ व सिर्फ मैं जानता हूँ ।। ———————————————– मैं खूद के सवालों के कठघड़े में सदा खड़ा रहता हूँ औरों की नजरों में, मैं क्या हूँ, ये औरों का सवाल है, मेरा नहीं, मैं क्या हूँ, ये सिर्फ व सिर्फ मैं जानता हूँ ।। ———&... »

PRAKRITI KI SHOBHA …

प्रकृति की शोभा से बढ़के कोई शोभा न होता रब तेरे जैसा यार जहां में कोई ना होता ।। ————————————————– हरिश्चन्द्र की शोभा, तु सत्य बनके आया राम बनके तुमने, सुग्रीव को उबारा सुदामा की दीन-दशा देखके, प्रभु तुमने अपना सर्वस्व मित्रता पे लूटाया ————————... »

MERA KUCH BHI NAHI HAIN

मेरा कुछ भी नहीं है, मुझमें राम सब-कुछ तेरा ही तेरा है राम बस देना साथ हमें सदा राम हम हैं तुम्हारे, तुम हो हमारे राम ।।1।। ——————————————— एक तेरा ही रूप फैला है कण-कण में राम एक तुम्हीं हो सृष्टि में सबकुछ राम व्याख्या की नहीं जा सकती तेरी महिमा की राम एक तुम्हीं हो सबकुछ राम ।।2।। ———R... »

*नेत्रदान*

अंधा ना कहो आँखों वालों, मुझे नेत्रहीन ही रहने दो। आँख नहीं ग़म का सागर है, कुछ खारा पानी बहने दो। तुम क्या समझो आँखों का न होना, एक छड़ी सहारे चलता हूं। अपने ही ग़मों की अग्नि में, मैं अपने आप ही जलता हूं। कभी सड़क पार करवा दे कोई, मैं उसे दुआएं देता हूं। देख नहीं पाता हूं बेशक, महसूस सदा ही करता हूं। यह दुनिया कितनी सुंदर होगी, चाँद, सितारे सूरज इनके बारे में सुनता हूं। कभी देख पाऊं इनको मैं, ऐस... »

कोई नहीं महान बना है

फूलों के बिस्तर पर जन्मा पला बढ़ा उल्लासों में । जिसको प्रचुर मिली सुविधाएं डूबा भोग विलासों में । है भूमिका भाग्य की लेकिन अथक परिश्रम किए बिना, कोई नहीं महान बना है अब तक के इतिहासों में । बड़े बड़ों के साथ खड़े होने में क्या महानता है ? हृदय तुच्छ तो हाथ बड़े होने में क्या महानता है ? है आकलन तुम्हारा इससे , किस पथ पड़ते पांव युगल ; जिस सीमा तक संकट सहते, मानो उसे वास्तविक बल ; गुणहीनों के गुणगान... »

जिंदगी

जिंदगी थी बस चंद लम्हों की दास्ता रह गयी अधूरी फिर भी अनकही, अनसुनी »

बस एक दिन याद करो

26 जनवरी, 15 अगस्त, देश भक्ति जगाओ, झण्डे फहराओ, बलिदान पर “उनके”, तुम इतराओ, फिर भूल जाओ भूल जाओ।। नारी दिवस, बालिका दिवस, कविता सुनाओ, मंच सजाओ, मौका मिले तो दानव बन जाओ, फिर भूल जाओ भूल जाओ।। जन्माष्टमी हनुमान जयंती, दुर्गा अष्टमी, गणेश चतुर्थी, झांकी सजाओ त्योहार मनाओ, गो माता का अपमान करो, दर से भिखारी भूखा भगाओ।। रामायण गीता जी पाठ कराओ, दशहरा आया, रावण जलाओ, अपने अंदर रावण पनपाओ... »

प्रदूषित पवन

आज फ़िर चाँद परेशान है, प्रदूषण में धुंधली हुई चाँदनी तारे भी दिखते नहीं ठीक से, आज आसमान क्यों वीरान है। आज फिर चाँद परेशान है। प्रदूषण का असर, चाँदनी पर हुआ चाँदनी हो रही है धुआं-धुआं। घुट रही चाँदनी मन ही मन, यह कैसी है अशुद्ध सी पवन दम घोट रही सरेआम है, आज चाँद फ़िर परेशान है। प्रदूषित पवन में विष मिले हैं, यह सुनकर सभी हैरान हैं। चाँदनी ले रही है सिसकियां, आज चाँद फ़िर परेशान है।। _____✍️गीता »

किसान की व्यथा

अन्न उपजाऊं फिर खाना खाऊं, जन्म ले लिया किसान के देश कहे अन्नदाता मुझको, बैठा हूं सड़कों पर शान से। दिल्ली के बॉर्डर पर पड़ा हूं, अपने हक की खातिर मैं खेत छोड़ बॉर्डर पर बैठा, मैं भी हूं भारत मां का बेटा धरती पुत्र कह लो, या फिर कहो किसान रे अन्न उपजाऊं फिर खाना खाऊं, जन्म ले लिया किसान के पूरी सर्दी गुजर गई है, दिल्ली के ठंडे बॉर्डर पर थोड़ा सा ध्यान धरो तुम मेरी भी चंद आहों पर दुखी हुआ था तब ही ... »

झरना

पर्वतों की गोद से निकल, झरने का जल बह चला। मिलन करूं मैं धरा से, यह कह कर चला। मिलन हुआ धरा से, पर उस मिलन में, घना ताप सहकर जल बना वाष्प,बने मेघ और बरखा बन बरस गया। जल पहुंचाया वहां तक मेघों ने, जहां जन जीवन जल को तरस गया। सफ़ल हो गया जीवन झरने का, झर-झर झरते कुछ कर गया।। _____✍️गीता »

नारी

नारी को न समझो खिलौना मनुज, वह भी एक इंसान है। जन्म देती है इंसान को, सोचो कितनी महान है। बन कर मासूम सी बिटिया, तुम्हारा घर महकाने आई है। बन कर बहन जिसने, सजाई भाई की कलाई है। करके विवाह तुम्हारे संग, घर जन्नत बनाया है तुम्हारी सहभागिनी बन, तुम्हारा वंश बढ़ाया है फिर किस कारण से , उसे तुम तुच्छ कहते हो वह ममता की मूरत है, तुम्हारे परिवार को निज मान, बड़े प्रेम से अपनाया है। वह पावन अग्नि सी महान ... »

सच की राह चले चलो

सच की राह चले चलो, चाहे हो व्यवधान, सच को ही सब ओर से, मिलता है सम्मान। मिलता है सम्मान, उसे जो सच होता है, झूठ हमेशा झूठ, बना इज्जत खोता है। कहे लेखनी मान बात सच को अपनाओ, झूठ दूर कर आज, खूब आनन्द मनाओ। »

कोमल सी दूब हो

राहों में आपके कोमल सी दूब हो, पाने का हो जुनून मन में उमंग खूब हो। आ जायें जब कभी मायूसियों के दिन कुहरे के बीच भी थोड़ी सी धूप हो। मन साफ हो दिखे वो सच में हो सच की छाया भीतर वही भरा हो बाहर जो रूप हो। हर ओर हो उमंगें उल्लास का सफर हो मन सब तरफ रमा हो बिल्कुल न ऊब हो। »

क़िताबें

जब भी मन घिर जाता है अपने अंतर्द्वंदों की दीवारों से, जब मस्तिष्क के आकाश में छा जाते हैं बादल अवसादों के…!! तब छांट कर संशय के अँधियारों को, ये जीवन को नई भोर देती हैं, ‘किताबें’…..मन के बन्द झरोखें खोल देती हैं..!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ »

ग़रीब का बच्चा

कुछ दिनों से , एक इमारत का काम चल रहा था। वहीं आस-पास ही, कुछ मजदूरों का परिवार पल रहा था। छोटे-छोटे बच्चे, दिन भर खेलते रहते कुछ खेल। एक दूजे की कमीज़ पकड़कर, बनाते रहते थे रेल। हर दिन कोई बच्चा इंजन बन, चलता था आगे-आगे। बाकी बच्चे डब्बे बन, पीछे-पीछे भागे। इसी तरह हर दिन, यही खेल चलता था और हर रोज एक बच्चा , इंजन या डब्बे में बदलता था किंतु एक बालक सदा ही गार्ड बनता था, एक दिन मैंने उस बालक से प... »

पुष्प पलाश के

लाल ओढ़नी ओढ़ कर, देखो पलाश इठलाते हैं। वन में फैली है अग्नि ज्वाला, ऐसा स्वरूप दिखलाते हैं। होली आने से पहले ही, पलाश ने कर ली तैयारी। लाल रंग के पुष्प खिला कर, महकाई है वसुधा सारी। लाल रंग की, प्रकृति ने सिन्दूरी आभा बिखराई है। सृष्टि स्वयं ही बता रही है, ऋतु बसन्त की आई है। बागों में कोयल आई है, तुम भी अब आ जाओ ना। सुर्ख़ पलाश के पुष्पों जैसी, ख़ुशबू बिखरा जाओ ना।। _____✍️गीता »

ऋतुराज बसंत

ऋतुराज बसंत फिर आया है, जड़ पतझड़ फिर मुस्काया है। पेड़ पर हैं नव कोपल फूटी, फिर कोयल ने राग सुनाया है। पिली – पिली सरसों लहराई, भीनी खुशबू को महकाया है। छिप कर के बैठे थे जो पंक्षी, सबने मिलके पंख फैलाया है। हर्षित हुआ फुलवारी सा मन, तितली बन फिर मंडराया है। सरस्वती माँ की अनुकम्पा से, क्या लिखना हमको आया है। राही कहे खुलकर सबसे की, ऋतुराज बसंत फिर छाया है।। राही अंजाना »

Page 2 of 2651234»