Author: Pragya Shukla

  • नन्ही-सी परी मेरी लाडली

    नन्ही-सी परी मेरी लाडली
    अब बड़ी हो गई
    बैग लेकर स्कूल पढ़ने जाने लगी
    हाथों में कॉपी पेन लेकर
    लिखने लगी
    अंग्रेजी में कविता सुनाने लगी
    आँखों में उसके हैं
    अनगिनत सपनें
    मेरी आँखों में भी सपने
    सजाने लगी
    स्कूली परिवेश पहनकर
    कितनी सोनी लगती है
    अब तो अपनी चोटी खुद
    ही बनाने लगी
    ए, बी, सी, डी उसकी उंगली
    पर रहते हैं
    अब तो वह जोड़ने-घटाने लगी..

  • ना जाने कितने दिल..!!

    अभिव्यक्ति बस दिल से:-
    **************
    रोते नहीं हैं हम बस सिसकते
    रहते हैं
    तेरी यादों में आहें हम भरते
    रहते हैं
    नासमझ है तू जो नहीं चाहता
    मुझको
    ना जाने कितने दिल हैं जो मेरी मोहब्बत में
    तड़पते रहते हैं…

  • तमाम रातें..

    अभिव्यक्ति बस दिल से:-
    ***************
    गुजारी हैं तमाम रातें हमने तेरे बगैर
    ये तो छोटी-सी जिंदगी है !
    गुजर जाएगी…

  • हौसलों के पंख..

    यूं तो आसमां पर नहीं ठिकाना अपना
    फिर भी हौसलों के पंख लिये जा रहे हैं
    उड़ना नहीं आता मगर ना जाने कैसे
    उड़ते जा रहे हैं..

  • राष्ट्रकवि:- रामधारी सिंह दिनकर’ को नमन

    दिनकर ऐसा सूर्य है जिसने
    हिन्दी जगत को अपनी लेखनी की
    किरणों से चमकाया
    देशहित में लिखकर
    देश का गौरव खूब बढ़ाया
    जिनके सूर्यातप के आगे
    शशि भी मलिन हो जाए
    ऐसे राष्ट्रकवि को प्रज्ञा
    शीश नवाए
    हिन्दी की खड़ी बोली का गौरव
    दिनकर ने खूब बढ़ाया
    उर्वशी लिखकर दिनकर जी ने
    हिन्दी साहित्य को एक रत्न
    चढ़ाया
    मीठी सरल, सरस भाषा में दिनकर जी
    लिखते थे
    पीड़ितों के दर्द को अपने
    काव्य में स्वर देते थे
    राष्ट्र चेतना जगाकर कवि ने
    विश्व में ख्याति है पाई
    बाल साहित्य और गद्य-पद्य
    दोनों विधा अपनाई
    पद्मविभूषण और मिला
    ज्ञानपीठ पुरस्कार
    रामधारी सिंह ‘दिनकर को
    जन्म दिवस पर हम सबका
    नमस्कार…

  • ड्रग्स रैकेट..!!

    ड्रग्स रैकेट से देश होता जा
    रहा है छिन्न-भिन्न
    कहाँ से शुरू हुई थी सुशांत की कहानी
    जाकर कहाँ पहुँची
    सितारों की जिन्दगानी
    मर रहा है देश का भविष्य गरीबी में
    ड्रग्स लिए जाते हैं यहाँ
    अमीरी में
    युवा गरीबी, बेरोजगारी में
    मरता जा रहा है
    फिल्मों का आशियां
    किस गर्त में डूबा जा रहा है ?
    ड्रग्स लेकर बेजान की जाती है जवानी
    क्या हिन्दुस्तानी खून में अब रहेगी
    नशे की रवानी !
    जिन्दगी को मौत के मुह में ढकेलती
    जा रही है
    नशे की लत देश को कहाँ ले जा रही है ?
    कब्र में जा रही हैं लाशें
    और युवा बेखबर है
    सुशांत की मृत्यु का राजदार
    आज भी अपने घर है..!!

  • कलयुग की सन्तान…

    एक दौर हुआ करता था
    जब नित वंदन करता था नन्दन..
    पिता के चरण दबाकर ही
    शयनकक्ष में जाता था
    नित उठकर मात-पिता को
    अभिनन्दन करता था नन्दन…
    अब समय हुआ परिवर्तित
    आई कलयुग की संतानें
    पिता बेटे को दुनिया माने
    बेटा बाप को बाप ना माने..
    बेटा ना करता है पिता का आदर
    ना दिल से सम्मान
    उस बाप की पीर कोई ना जाने
    बुढ़ापे की लाठी’ ही जब
    लाठी मारे
    क्या होगा उस पापी संग
    वह इस बात से है अन्जान
    समय हुआ परिवर्तित
    आई कलयुग की सन्तान..!!

  • गैंग रेप**

    बारी-बारी लूटा मुझको
    बारी-बारी रौंदा
    नारी होने पर बेबस थी
    खत्म हो गया जीवन का औधा
    ना..री…ना रो
    एक दिन मिलेगा तुझको
    इन्साफ सबने यही
    समझाया
    जब कोर्ट में सवालों ने किया शर्मिंदा
    कुछ भी ना समझ आया
    इतना लज्जित ना हुई थी तब
    जब यह कुकृत्य हुआ था
    जैसा लगा है वकीलों के सवाल से
    ऐसा कभी ना लगा था
    मैं पछताई जो सोंचा मैंने
    इन्साफ मुझे मिल पाएगा
    पुरुष प्रधान देश में ऐसा
    कुछ भी ना संभव हो पाएगा
    गैंग रेप से पीड़ित होकर
    इन्साफ की आस में जिन्दा थी
    कोर्ट में सबके सवालों के आगे
    बेबस थी शर्मिंदा थी..

  • आस्तीन का सांप

    किसी के लिए दोस्त फरिश्ते हैं
    किसी के लिए जिन्दगी जीने का बहाना
    मेरे लिए सिर्फ आस्तीन का सांप हैं
    नहीं है दिल में अब दोस्तों के लिए
    कोई ठिकाना…

  • मैं तुलसी तेरे आंगन की*****

    क्यों जताया जाता है
    प्रतिपल
    मैं दूसरे घर की लक्ष्मी हूँ
    हूं कुछ दिनों की मेहमान
    क्यों कहा जाता है
    हर पल यह एहसास
    होता है कि किस घर की हूँ मैं
    अपने ही माँ-बाप कहते हैं
    पराई अमानत हूँ मैं
    किसी रीति-रिवाज में
    बेटियों की जगह नहीं होती
    बहुएं ही हर कार्य में हैं आगे होती
    जब विवाह होता है
    जाती हूँ अपने घर
    यह सोंचती हूँ इसकी हर प्रथा मेरी है
    शामिल होती हूँ खुशी से
    हर रिवाज में
    गलती से भी कोई भूल हो जाए तो
    खाती हूँ डाट मैं
    वो कहते हैं तू तो पराया खून है
    तुझे कहाँ पता इस घर का कानून है
    कुल को गाली पल में दे दी जाती है
    घर की लक्ष्मी पल में पराई हो
    जाती है
    आखिर कौन है जो मानना है
    कहता मुझे अपना
    मेरा अस्तित्व बन गया है महज सपना
    कोई तो कहे मुझे प्यार से अपना
    बता दे ऊपरवाले तू ही मुझे
    आखिर किससे कहूँ
    ” मैं तुलसी तेरे आंगन की” !!

  • ससुराल की सूखी रोटी…

    ****************
    मेरी किस्मत रंगी है काले
    रंग में
    दर्द ही है जीवन के हर
    अंग में..
    आँसुओं की लकीरें कभी
    मिटती नहीं बल्कि
    और गहरा जाती हैं
    जब किसी की बातें मेरे
    दिल को दुःखाती हैं..
    बेवजह कैसे कोई अपमान
    कर सकता है ?
    आखिर कब तक कोई ये
    कड़वा घूँट पी सकता है..
    मुस्कुराने की हर वजह
    मुझसे रूठ जाती है
    होंठों की मुस्कान आँख का
    आँसू बन जाती है..
    चली जाऊंगी एक रोज
    ये जहान छोंड़कर
    मुड़ के ना देखूंगी ना आऊंगी
    लौटकर..
    चाहे कितने भी दर्द मिलें
    सब सह लूंगी
    ससुराल की सूखी रोटी का
    भी मान रख लूंगी..
    तकलीफें बर्दास्त के बाहर
    हुईं तो मर ही जाऊंगी
    पर मायके कभी लौटकर
    ना आऊंगी..

  • दुःखी आत्मा….!!

    निस्तेज-सी
    स्तब्ध-सी
    असहाय-सी
    अधूरी-सी
    निर्वेद-सी
    बैठी थी..
    दुनिया की सबसे दुःखी आत्मा
    मैं ही थी…
    आपा खोकर भी मौन थी
    तुमसे दो टूक
    करने के बाद
    सारे ऱिश्ते खत्म करने
    के बाद
    क्रोध में आकर
    फेंक दिया मैंने
    छत से अपना प्यारा फोन!!

    बैटरी अलग
    ढक्कन अलग
    यूं बिखर गया..
    उठाया, समेटा, जोड़ा
    पर ना खुला
    ना चला
    टूटा तो नहीं परन्तु
    आह !
    मेरा फोन भी तुम्हारे प्यार में
    मेरी तरह अन्धा हो गया..
    ना वो बनवा पाई
    ना दूसरा ही खरीद पाई…!!

  • एसिड अटैक

    मेरी जिंदगी की एक शाम थी
    मैं घर जा रही थी
    कोई नहीं था साथ में
    अकेली ही आ रही थी..
    कुछ मनचले पीछा कर रहे
    थे रोज की तरह
    मैंने भी नजरंदाज कर दिया
    रोज की तरह..
    एकाएक चारों ओर से
    घेर लिया मुझे
    कुछ फेंका मेरे चेहरे पर
    पानी जैसा लगा मुझे..
    भाग गये सारे मुझ पर एसिड फेंक कर
    मैं सड़क पे तड़प के गिर पड़ी
    चेहरे की एक-एक हड्डी हो
    जैसे गल गई..
    जाने कौन ले गया उठाकर
    किसने किया उपचार ?
    मुझे होश आया तो परिजन
    बैठे थे आस-पास..
    मेरे सौन्दर्य के साथ मेरी आत्मा
    भी मर गई
    देखा जब आईना तो मैं
    स्वयं से डर गई..
    जिस चेहरे से पहचान थी
    वह भयावह हो गया
    जिसने किया था प्रेम को परिणय
    तक पहुंचाने का वादा
    वह अनायास ही मुकर गया..
    जी रही हूँ आज भी एक
    अलग पहचान से
    जानते हैं सब मुझे और
    देखते हैं मान से..
    मेरी आत्मा मरी नहीं
    जला है सिर्फ रूप ही
    जीने के मायने बदल गये
    हौंसलों ने संवार दी जिंदगी…..

  • बलात्कार:- एक अभिशाप

    जीवन के पहले प्रभात में
    ली मैंने अंगड़ाई
    बाल्यकाल था बीता किशोरावस्था
    की बेला आई..
    रोंक-टोंक थी ज्यादा मुझ पर
    समझ नहीं मैं पाती थी
    बचपन से मैं ट्यूशन पढ़ने
    चाचा जी के घर जाती थी..
    एक दिन ऐसा हुआ कि मैं
    पहुँच गई चाचा से पढ़ने
    चाची जी कहीं गई थीं बाहर
    केवल चाचा ही थे घर में…
    वैसे रोज़ डाटते थे उस दिन
    प्यार से मुझको पास बुलाया
    पानी में कुछ मिला-जुला के
    कोल्डड्रिंक बोल के मुझे पिलाया…
    उनकी हरकतें कुछ ठीक ना थीं
    मैं घर जाने को आतुर हो आई
    हाथ पकड़कर मेरा चाचा ने
    फिर एक चपाट लगाई…
    भूखे भेंड़िये सम वह मेरे
    अंग-अंग को नोच रहे थे
    मैं वो कोमल-सी कली थी
    जिसको पैरों से वह रौंद रहे थे…
    चाचा मैं तो तेरी बेटी हूँ
    यह हाथ जोड़ मैं बोल रही थी
    कृष्ण सुदर्शन धर आएगे
    मन ही मन में सोंच रही थी…
    बूंद-बूंद रस पीकर उसने
    तन को मेरे जीर्ण किया
    मेरे मृत शरीर को उसने
    सौ टुकड़े कर बोरी में किया…
    फेंक दिया नदिया में जाकर
    घरवालों को फिर फोन मिलाकर
    आज ना आई ट्यूशन पढ़ने
    थाने में आया ये रपट लिखाकर…
    दो महीने के बाद मिला
    मेरा शव बोरी में भरा हुआ
    मेरा फोन उसी बोरी में था
    जिससे सारा पर्दाफाश हुआ…
    वह भाग गया था, पकड़ा गया
    कानून ने भी इन्साफ किया
    मेरी सखी ने जब उस पापी
    का पुलिस को असली पता दिया..

  • बहन की मुराद !!

    वो हर कदम साथ देती थी
    मेरा,
    चाहे जितनी मुसीबतों ने हो घेरा..
    हर मन्दिर में मेरी सलामती की
    दुआ मांगती थी,
    मैं बन जाऊं बड़ा यही मुराद
    मांगती थी..
    पैरों में जूते भी ना थे,
    ना माँ-बाप का साया,
    करके चाकरी घर-घर मेरी
    बहन मुझे पढ़ाया..
    आज बन गया हूँ मैं अफसर,
    गाड़ी बंगला है नौकर-चाकर..
    पर कोई भी खुशी नहीं है
    जिसने देखे थे ये सपने
    वो बहना ही दुनिया में
    नहीं है..
    मेरे सपने पूरे करते-करते,
    कोरोना महामारी के चलते..
    चली गई वह छोंड़ के दुनिया,
    किस काम की है ये सारी खुशियाँ !!

  • “बालू का ढेर”

    ख्वाहिशों की बदलियां
    छटने लगी हैं आजकल
    मुहब्बत की रेत फिसलने
    लगी है आजकल
    काजल आँखों का दुश्मन
    बन बैठा है
    मेहंदी से भी अब कोई
    कहाँ नाम लिखता है
    दिल की किताब के सारे
    पन्ने फट गये हैं यूँ
    किसी भी तरह से ना कोई
    पन्ना जुड़ता है
    बालू के ढेर पर बैठी हूँ
    आशियां बनाने समुंदर में
    अब कहाँ कोई ज्वार
    उठता है
    ले जाएगा बहाकर एक रोज़
    कोई समुंदर में बहाकर
    ये खयाल आजकल
    बार-बार उठता है…

  • प्रवासी मजदूर का वेश..

    जा रहा हूँ आज फिर परदेश
    जहाँ से आया था
    धर प्रवासी मजदूर का वेश
    छोंड़ी थी जो गलियां यह सोंचकर मैंने
    के कभी ना लौटकर अब आऊंगा
    घर की बची रूखी-सूखी ही खाऊंगा
    जब नहीं मिला गांव में काम
    और जेब में फूटी कौड़ी तो
    निकल पड़ा छोंड़ पत्नी और मौड़ी
    मौड़ी का ब्याह इसी साल करना है
    मौड़े का घर भी तो बसाना है
    पत्नी की बीमारी का इलाज कराकर
    ताउम्र उसी संग रहना है
    जिम्मेदारियां निभाते हुए अगर
    जिंदा लौट आया
    काल का ग्रास ना जो बन पाया तो
    लौट आऊंगा फिर गांव की
    इन्हीं गलियों में
    बुढ़ापा काट लूंगा पत्नी के
    संग झोपड़ी में!!

  • आज भी माँ की गोद में..

    आज भी माँ की गोद में सिर रखकर
    सो लेता हूँ
    होता हूँ उदास कभी तो लिपटकर
    रो लेता हूँ
    माँ को गुजरे जमाने हुए हैं मगर
    मैं आज भी माँ से मिलकर
    प्यार बटोर लेता हूँ…

  • मन के कोंण*******

    *************
    हे आराध्य प्रेम !
    आज मैं तुम्हें
    प्रणाम करती हूँ
    क्योंकि तुम ही हो
    जिसने मुझे जैविक से
    सामाजिक प्राणी बनाया
    मेरे अन्तस में भाव स्फुटित हुए
    मन के कोंण रोम-रोम को
    सहला बैठे
    बंजर धरती पर पुष्प खिल उठे और
    मेरे अंतर्मन में किसलय
    निकलते लगे
    तुम्हारे ओज के
    आलोक से मैं रति समान
    मनमोहिनी बनी
    तुम्हारे आगमन से ही मैं
    परिपूर्ण हुई
    मेरे अंतस में कविताओं का
    संगम भी तुम्हीं से हुआ
    मैं राधा भी तुम्हारी कृपादृष्टि
    से बनी और तुलसीदास भी !!
    इन उपहारों के लिए
    हे आराध्य प्रेम !
    मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ….

  • हे हिमाद्रि…!!

    हे हिमाद्रि !
    सदियों से जब मैं नहीं थी
    तब भी
    तुम यूँ ही अडिग खड़े थे
    और आज भी एक इंच
    तक ना हटे
    भारत का शीर्ष मुकुट बनकर
    खड़े हो तुम
    गंगा को बहाकर तुम
    हम सबका उद्धार करते हो
    ना जाने कितनी औषधियों
    को उपजाकर तुम
    प्रतिवर्ष, प्रतिफल देते हो..
    विनाशकारी ओलावृत्तियों
    भूकंप और तूफान में भी तुम जरा भी
    ना घबराये
    बर्फ की चादर ओढ़ कर
    तुमने धूप का आलोक
    बढ़ाया
    पंक्षियों, वृक्षों को अपने
    अंक में सुलाया…
    अपनी विशालकाय भुजाओं से
    सदा तुमने
    देश की रक्षा की
    ऐसे
    सर्वोत्तम, श्रेष्ठतम और निःस्वार्थ सेवा हेतु
    हे हिमाद्रि!
    मैं तुम्हें पद्मश्री,
    पद्मविभूषण और भारत रत्न जैसे पुरस्कारों से
    अलंकृत करती हूँ….

  • कब तलक

    कब तलक निगाहें यूँ चुराओगे
    है यकीन एक दिन तो पास आओगे..

  • “मेरी मुस्कान पर ना जाओ दोस्तों”

    मेरे होंठों की मुस्कान पर
    ना जाओ दोस्तों!
    ये तो मेरे यार की तरह फरेबी है!
    मेरे आँसू हैं मेरी असली पहचान
    जो बंद कमरे निकलते हैं
    कभी तकिये से आकर पूँछों
    हम उसे कितना भिगोते हैं!!
    सिसकियाँ सुन-सुनकर मेरे
    कमरे की दीवारों में दरारे
    आ गई हैं
    तन्हाई से पूँछों हम कितनी
    बातें करते हैं
    चाँद देखते हुए गुजार देते हैं
    रातें
    जुगनू पकड़कर हम
    मुठ्ठियों में बंद करते हैं
    सितारों से पूँछों कभी हम
    उन्हें कितनी बार गिनते हैं…
    मेरी मुस्कान पर ना जाओ दोस्तों !!

  • कलम भी रो पड़ी…

    मेरे जीवन की कहानी
    दुःख ही रही
    आखिर क्या लिखूँ आज
    जो अभी तक मैंने लिखा नहीं…
    विधाता ने मेरे भाग्य में
    आँसुओं के सिवा कुछ
    भी लिखा नहीं…
    मेरे पतझड़ समान जीवन पर
    बरसात हमेंशा बनी रहती है
    हर पल नैन बरसते रहते हैं…
    मेरी व्यथा से
    सारे पन्ने भर गये
    कलम भी बेबस होकर
    रोने लगी
    इतना दर्द था मेरे एक-एक
    लफ्ज में…!!

  • पिछली बरसातों में

    खोखलापन है तुम्हारी बातों में
    अब ना रही तेरे लिए
    मेरे दिल में वो जगह !
    जो हुआ करती थी पिछली बरसातों में..

  • कविता में भाव

    वो कहते हैं तुम्हारी कविता में
    भाव नहीं हैं
    मैं क्या जवाब दूं
    जब दिल ही नहीं हैं !!

  • आईने ने कहा….

    कल रात मैंने अपने आईने से कहा-
    आजकल मैं बहुत अच्छा लिखने लगी हूँ
    सब कहते हैं..
    आईने ने कहा दिल जो टूट गया ना !!

  • “कलम में स्याही”

    कबूतर को भेजूं
    अब वो जमाना नहीं रहा
    खुद जाकर मिलूं
    यह सम्भव नहीं रहा
    कितने खत लिखे हैं
    उसके लिए मैंने
    डाकिया कहता है
    खत का जमाना नहीं रहा
    कलम में स्याही नहीं बची
    इतने खत लिखे मैंने
    ऱखने के लिए उनको
    कोई ठिकाना नहीं रहा
    किस पते पर भेजूं मैं डाकिए को
    वो तो मुझ में ही समा गया
    अब उसका अलग पता नहीं रहा..

  • इश्क आँच पर पकता रहा…

    यूँ ही सिलसिला चलता रहा
    कभी मैं कभी वो रूठता रहा
    टूटने लगे दिल बेतहाशा
    मगर इश्क आँच पर पकता रहा..

  • बालश्रम:- “गरीबी का थप्पड़”

    दूध के दाँत पालने में ही
    टूट गये
    गरीबी का थप्पड़ इतनी
    जोर से पड़ा
    लाद दी जिम्मेदारी की पोटली
    कंधों पर
    बचपन के खिलौने पल में
    टूट गये
    थमा दी चाय की केतली
    जब मुझे
    तब जानी मैंने शिक्षा की कीमत
    जिन्दगी की आड़ी-सीधी रेखाएं
    यूँ खिंच गईं
    माजते-माजते ढाबे के बर्तन
    कोमल हथेलियां वयस्क
    हो गईं
    जरूरी नहीं चाय बेंचने वाला
    हर प्राणी राजा बन जाए !
    बालश्रम बचपन को
    लील जाता है
    गरीबी का थप्पड़ जब
    जोर से पड़ता है..

  • आत्मनिर्भर बन

    शिक्षा की खदानें बंद करो
    डिग्री बेचने वाली दुकानें बंद करो
    छात्रों को डालो जेलों में
    शिक्षकों की तनख्वाहें बंद करो
    ना लूटो हमको शिक्षा के नाम से
    ज़रा डरो राम के नाम से
    व्यापार मत करो तुम ज्ञान की वृद्धि पर
    कंधर पड़े हैं तुम्हारी बुद्धि पर
    जब शिक्षा का कोई अर्थ नहीं
    तो हम समय करेंगे व्यर्थ नहीं
    लगाएंगे चाय और पकौड़े की दुकान
    आत्मनिर्भर बन हो जाएंगे महान।

  • एक फूल दो माली***

    करुण रस की कविता:-
    *****************
    जिसने हमको प्यार किया
    मेरी राह में सुबहो से शाम किया
    ना कद्र की हमनें
    एक पल भी उसकी
    अपशब्दों का उस पर वार किया
    एक रोज़ मैं बैठी थी
    अपने प्रिय के साथ जहाँ
    आ पहुँचा लेकर
    वो पागल फूल वहाँ
    मैं अपने प्रिय की संगिनी थी
    प्रेम में मेरे निष्ठा थी
    मैं बोली उठ चल ओ पगले !
    तेरा मेरा कोई मेल नहीं
    प्यार मोहब्बत एक इबादत है
    बच्चों का कोई खेल नहीं
    वह सुनता रहा चुपचाप खड़ा
    मेरे प्रिय की ओर मुड़ा
    मैं बोली मेरे साजन हैं
    मेरे हिय के बसते आँगन हैं
    वह टूटा जैसे पुच्छल तारा
    गिर पड़ा मोहब्बत का मारा
    लग रहा था जैसे कोई जुआरी
    चौंसर में अपना सबकुछ हारा
    पड़ी हुई थी ब्लेड वहाँ पर
    वह बिखरा हुआ पड़ा था जहाँ पर
    झट से उसनें काटी अपनी कलाई
    उसकी जान पे यूँ बन आई
    हमनें सबको वहाँ बुलाया
    सरकारी में भर्ती करवाया
    बिलख-बिलखकर रो मैं रही थी
    उसकी माँ बेहाल पड़ी थी
    खबर आई वह कोमा में गया है
    फिर पता चला वह दुनियाँ छोड़ चला है।

  • गिले-शिकवे

    गिले-शिकवे जरा
    कम कर दिये हमनें
    जब से वो दूजी गली जाने लगे
    वो हमसे दूर रहकर खुश रहेंगे
    इसलिए हम ये दुनिया छोड़ आज
    जाने लगे।।

  • हिंदी गंगाजल है ।।

    रोम-रोम में बसी हमारे
    हिंदी राजभाषा है
    बन जाए यह राष्ट्रभाषा
    इस जीवन की यह आशा है
    हिंदी है परिपक्व, परिपूर्ण
    हिंदी ही ममता-सी निर्मल है
    हिंदी है लहू में अपने
    हिंदी ही कण-कण में मिश्रित है
    हिंदी मां के आंचल में है
    हिंदी ही गंगाजल है
    हिंदी है कवि के मन की पीड़ा
    हिंदी ही शब्द-सागर है
    हिंदी है संस्कृत की बेटी
    हिंदी ही प्रज्ञा की जननी है
    हिंदी है सबसे सरल, मनोरम
    हिंदी ही उर्दू की भगिनी है।।

  • “आओ मनाएं हिंदी दिवस”

    हिंदी दिवस:-

    चौदह दिसंबर को हर वर्ष
    हिंदी दिवस मनाया जाता है
    उसी दिन क्यों हिंदी को
    सम्मान दिलाया जाता है
    हिंदी तो ऐसे ही वाणी है
    जो भारतीय परंपरा पर चलती है
    देशी हो या विदेशी
    हर भाषा को आत्मसात करती है
    देवनागरी लिपि की शोभा
    हिंदी ही बढ़ाती है
    भारत माता के माथे की स्वर्णिम
    बिंदी मानी जाती है
    यह कवियों की निज वाणी है
    इसे समझता भारत का हर प्राणी है
    भारत के संविधान में राजभाषा
    से सम्मानित है
    फिर क्यों नव युवकों द्वारा
    यह इतनी अपमानित है
    इसे बोलने में आखिर कुछ लोग
    क्यों सकुचाते हैं
    छब्बीस आखर वाली भाषा बोलकर
    इतना क्यों इतराते हैं
    हर भाषा को सम्मान दिया है
    हमारी प्यारी हिंदी ने
    क्षेत्रीय बोलियों को भी मान दिया है
    हमारी न्यारी हिंदी ने
    तो आओ मनाए हिंदी दिवस
    बनाएं हिंदी को जीवन का सार
    इसकी गौरव गाथा गाये हर प्राणी
    सात समुंदर पार।।

  • टूटा हुआ दिल

    अभिव्यक्ति ह्रदय से:-
    +++++++++++++
    आज तोड़ दिया तुमने
    मेरा टूटा हुआ दिल !
    ऐसा लग रहा है जैसे
    सीने पर एक पत्थर-सा रखा है मेरे।
    एक तुम ही थे
    जिससे थोड़ी बहुत उम्मीदें लगा रखी थीं मैंने !
    तुमने भी मुंह मोड़कर मुझे
    मुंह के बल गिरा दिया।।

  • किताबों के दिन !!

    कहाँ रहे अब किताबों के दिन !!
    अब तो बस अलमारी में
    रखी हुई किताबें
    धूल खाया करती हैं
    गुजरती हूं जब कभी
    उनके करीब से तो
    मुझे बड़ी उम्मीद से देखती हैं
    कि शायद आज मैं उन्हें
    स्पर्श करूंगी, उठाऊंगी,
    खोलूंगी, पढूँगी और झाड़ूगी
    उनके ऊपर से धूल की परतें !
    जो न जाने कब से जमी हैं
    और जब मैं मुंह मोड़कर चल देती हूँ
    तो वह ना-उम्मीद उठती हैं।।

  • धूप तो रहेगी।

    मैंने बड़े प्यार से पूछा आज उससे
    अगर मैं ना रहूं तो
    मेरी कमी तुम्हें खलेगी ?
    उसनें जवाब दिया-
    बादल चाहे जितने हों पर धूप तो रहेगी।

  • सजा मेरी

    प्यार करना थी खता मेरी
    बता तो देते क्या थी सजा मेरी…

  • ख्वाइशों के पन्ने !!

    बेजान है ये जिस्म मेरा
    लफ्ज भी लड़खड़ा रहे हैं
    भाव हैं बिखरे हुए
    हम सिमट ना पा रहे हैं
    ख्वाहिशों के पन्ने
    भीगे हैं अश्कों से मेरे
    बोलना बहुत कुछ चाहते हैं
    पर कुछ भी कह ना पा रहे हैं !!

  • हीरे जड़ी अंगूठी *****

    ❤❤ अभिव्यक्ति दिल से ❤❤
    ***************************
    पहली मुलाकात
    और पहली भेंट
    आज भी याद है मुझे…
    वह बरगद के नीचे बैठकर
    करी थी जो बातें हमने
    दिल आज भी बेताब है…
    तुम कुछ लाए थे मेरे लिए
    बड़े प्यार से
    दोनों घुटने टेककर मेरे सामने बैठे थे
    और एक अंगूठी निकालकर
    तुमने शिद्दत से मुझे पहनाई
    वो हीरे जड़ी अंगूठी मुझे बहुत भायी…
    वो अंगूठी आज तक मैंने
    नहीं उतारी
    मेरे हाथों की खूबसूरती
    आज भी बढ़ाती है
    जब देखती हूं उसे
    तो तुम्हारी बहुत याद आती है…
    न जाने क्या था हमारे बीच!
    पर जो भी था
    बहुत खूबसूरत-सा एहसास था…
    मेरे दिल की बंजर धरती पर
    तुमने ही प्यार के फूल खिलाए
    तुम ना आते तो शायद हम
    निर्मोही ही रह जाते
    प्यार क्या होता है जान ही नहीं पाते।।

  • नए युग का सूत्रपात

    चल साथी चल करें हम
    नये युग का सूत्रपात
    बढ़ चलें नवीन पथ पर
    हाथों में लेकर हाथ
    ना जाति-पांति के बंधन हों
    ना मरी हुई संवेदनाएँ
    ना लाशों के ढेर लगे हों
    ना आगे बढ़ने की आपाधापी
    हों स्वर्णिम स्वप्न और
    हों प्रेम के प्यारे बंधन
    हाथ बढ़ाकर सब सहयोग करें
    थके ना फिर कोई यौवन
    ना हो व्यथा ना कोई व्यथित हो
    सबके मन में प्रेम फलित हो।।

  • भ्रूण हत्या

    मेरा जिससे था प्रेम प्रसंग
    वो रहता था हर पल मेरे संग
    हम एक दूजे के साये थे
    जन्मों बाद करीब आए थे..
    वो हाथों में हाथ लिए बैठा था
    बोला मुझसे विवाह रचा लो
    मुझको अपना पति बना लो
    मैं बोली विधाता को मंजूर नहीं
    घर वालों को करूंगी मजबूर नहीं
    तुम प्रेम हो मेरा यह तय है
    तेरे दिल में ही मेरा घर है
    पर भ्रूण हत्या का पाप
    मुझसे ना हो पाएगा
    तेरे वियोग में ही प्रियतम
    मेरा यह जीवन जाएगा
    वह चौंका उठकर खड़ा हुआ
    कैसी भ्रूण हत्या यह प्रश्न किया
    मैं बोली बेटा-बेटी हैं एक समान पर
    बेटी से ही है परिवार का मान
    दहेज देना नहीं खलता है
    किसी माँ-बाप को
    जब बेटी किसी संग चली जाती है
    घरवालों की नाक कटाती है
    उसी क्षण की खातिर हर दम्पति डरता है
    बेटी पैदा होने से डरता है
    मैं यदि तेरे संग विवाह रचाती हूँ
    वंश की लाज ना बचाती हूँ
    तो कोई भी दम्पति बेटी को कोख
    में ही मार बैठेगा
    मेरा परिवार लोकलाज के कारण
    आत्म हत्या कर बैठेगा
    एक तेरा प्यार पाने की खातिर मैं
    माँ-बाप को जीतेजी ना मार पाऊँगी
    बेवफा बन जाऊँगी पर भ्रूण हत्या का
    पाप सिर ना ले पाऊँगी…

  • सीता-राम की प्रथम भेंट

    सीता वियोग में बहुत
    विकल थे
    प्रज्ञा के श्रीराम !
    एकाएक याद हो आई
    सिय से प्रथम मिलन की बेला !!
    ज्यों घोर तिमिर में कौंध
    उठी हो अकस्मात दामिनी
    त्यों राम हृदय में
    जगमगा उठी
    सीता से जनक वाटिका में
    हुई प्रथम भेंट
    लता-कुंजों की ओट से
    सीता-राम दोंनो एक दूजे को
    निष्पलक देख रहे थे..
    फिर संकोचवश नेत्र संगोपन
    करने लगे
    नेत्र निमीलन और उन्मीलन
    की इस प्रक्रिया से कोयल
    कूँकने लगती हैं
    मकरन्द बिखरने लगते हैं
    आकाशमार्ग से पुष्पों की
    वर्षा होने लगती है
    रामभक्त प्रज्ञा !
    का हृदय
    उनकी तुरीयावस्था देखकर
    अच्युत रह जाता है और
    आत्मविस्तृत हो उठता है…

  • नींद हरजाई..!!

    एक सवाल पूंछना है तुमसे
    एक बार आकर तो मिलो
    सब कुछ तो ठीक हो गया है
    तुम्हारे जाने के बाद…
    पर नींद कहाँ गुम हो गई
    यही पूंछना है मुझे
    रातें चाँद, तारे देखकर
    और नगमें
    सुनकर बिता देती हूँ
    ख्वाबों को छत पर सुला
    देती हूँ…
    खिड़कियां खोल के रखती हूँ
    शाम से अपनी
    कल्पनाओं से भी आँख चुरा लेती हूँ…
    बिस्तर रेशम का बिछा रख्खा है
    माँ को भी बाहर सुला
    रख्खा है
    शोर ना करना जरा भी
    मेरे कमरे के आस-पास
    सख्त ये नियम बना रख्खा है…
    निहारती रहती हूँ
    मैं चारों तरफ
    आयेगी नींद तो स्वागत में
    बंदकर लूंगी पलकें
    जाने नहीं दूंगी उसे
    सुबह तलक…
    रोज़ करती हूँ मैं ऐसा ही
    पर ना आती है नींद हरजाई
    पहले तेरे खयालों में ना सो
    पाती थी
    अब सोने ना दे तेरी
    रुसवाई…

  • दादी माँ की बरसी

    आंगन में एक पाटा रखकर
    पण्डित और परिचितों को
    बुलाकर
    लगा तैयारी में पूरा घर
    पकवान और मिष्ठान
    बनाकर
    हाथ जोड़कर सब बैठे हैं
    दादी की बरसी है आज
    एक बरस होने को आया
    पर दादी को कोई भूल ना
    पाया
    लगता है जैसे कल की ही
    बात हो
    दादी बैठी थी आंगन में
    कुछ हँसकर बोल रही थी
    अपनी पोटलियां टटोल
    रही थी
    मैं लेकर चाय गई दादी के पास
    उन्होनें दिया था आशीर्वाद
    कुछ बातें उनकी आज जब
    मन करता है सुन लेती हूँ
    उनकी आवाज रिकार्ड है
    मेरे पास
    आज उनकी बरसी की बेला
    भी आ गई
    आगन की वो जगह सदा के
    लिए सूनी हो गई..

  • बेटी:- दो कुल का अभिमान

    होंठों की मुस्कान है बेटी
    सबके घर की शान है बेटी
    बेटा तो है कुल का दीपक
    दो कुल का अभिमान है बेटी..

  • चाय की तरह

    मैंने कोई मौसम नहीं देखा !
    मैंने तुम्हें चाहा है चाय की तरह !!

  • बेखुदी

    बेखुदी में जो उठ गये थे कदम
    तेरी बेवफाई याद आते ही
    खुद-ब-खुद रूक गये…

  • बेतहाशा मोहब्बत

    वो आज भी मुझे बेतहाशा
    मोहब्बत करता है,
    यकीन नहीं है मगर
    दिल को यही लगता है..

  • सावन की लगन…

    ऐसी लागी लगन
    सावन की मुझे,
    मैं तो घड़ी-घड़ी कविता
    बनाने लगी..
    कभी सोते हुए
    कभी जगते हुए,
    बेखयाली में कुछ
    गुनगुनाने लगी..
    गजलों में मगन,
    नज्म़ों में मगन,
    कल्पनाओं में दुनियां
    बसाने लगी..
    छोंड़ा मैंने उसे
    प्यार करती थी जिसे,
    सावन को मोहब्बत
    जताने लगी..
    ओ कवियों! मुझे
    उन्माद तो नहीं,
    बेवजह आज कल
    मुस्कुराने लगी..

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