इतना चाहती हूँ इतना ना इतराया करो,बेरूखी में, ना दिन जाया करो यूँ दूर ना मुझसे रहो,बुलाने से पहले आ जाया करो क्यू खामोश हो या खुद में ही मदहोश हो चुप हो ऐसे तुम […]
इतना चाहती हूँ इतना ना इतराया करो,बेरूखी में, ना दिन जाया करो यूँ दूर ना मुझसे रहो,बुलाने से पहले आ जाया करो क्यू खामोश हो या खुद में ही मदहोश हो चुप हो ऐसे तुम […]
आवरण मेरा बहुत ही भव्य है, आचरण में दाग धब्बे पड़ गए, जम गई अंतः पटल में कालिमा भाहरी दिखने की है यह लालिमा। – डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत उत्तराखंड।
खूब पढ़े खूब बढ़े शिक्षा ही जीवन का आधार है, इसके बिना जीवन निराधार है। शिक्षा ही जिन्दगी का सच्चा अर्थ बताती हैं, सत्य और अनंत उन्नति का मार्ग बताती है। शिक्षक नित नवीन सबक […]
जब तुम यूँ समर्पण भाव से मुझे देखते हो.. अनगिनत आकांक्षाएं उमड़ उठती हैं ह्रदय में… मेरी थर्राई देह तप्त लौह -सी दहक उठती है जब तेरी सांसों का घूंट पीती हूं मैं… जाग उठते […]
जीतकर अक्सर मैं यूँ ही हार जाता हूँ बनकर खुशी मैं बहन का चेहरा सजाता हूँ।
क्या लिखा करता था मैं ये भूल गया बहन ने हौसला बढ़ाया है। जब उदास हुआ हूँ मैं तेरे धोखे से बहन ने मुस्कुराना सिखाया है।
फ्रिज में रखी शब्जी की तरह धीरे धीरे खराब हो रही है मेरी लय, कल कहीं बेसुरा न हो जाऊं पढ़ ले जल्दी से उन पंक्तियों को जो मैंने तेरे लिए लिखी हैं। —- डॉ0 […]
सांप! मारना नहीं चाहिए था ये वाला वो बता रहे हैं ये पानी वाला सांप था जानता था कितने सांप, मगरमच्छ और है उस तालाब में उसे रखना चाहिए था एक वीआईपी वाले बिल में […]
मुकम्मल कभी वो प्यार नहीं जो तवज्जो रंगे नूर से मिले जो सीरत से दिल लगाए वो मुहब्बत कमाल होती है @अनीता
माथे पर शिकन से उभरती लकीरों को देखकर एक फ़कीर ने कहा तूने बुलंद किस्मत है पायी उसे क्या पता था कि एक जान के बदले में गिरवी रख आया हूँ अपनी सारी कमाई ©अनीता […]
शतरंज में अक्सर बाज़ियाँ पलट जाती हैं अक्लमंदी से मोहरे चलना ए बाज़ीगर किस्मत बुलंद हैं गर अदने से मोहरे की तो राजा के हिस्से में शह और मात आती है ©अनीता शर्मा अभिव्यक्ति बस […]
दूरियां ज़बरदस्त कायम है दरमियाँ दो दिलों के कौन जाकर समझाए उन्हें किस्मत से मोहब्बत मिलती है दिलों में रंजिशें हो तो इश्क़ मुकम्मल हुआ नहीं करते ©अनीता शर्मा अभिव्यक्ति बस दिल से
जब सावन के एक एक बूंद, अंबर से धरती पे गिरती है। तब न जाने क्यों ए ग़ालिब, अश्क मेरी गालो को भिगोती है।।
देह में अभिमान की गर्मी पड़ी आसुंओं के स्रोत सूखे पड़ गये नैन की झिलमिल सुहानी पुतलियां आग के ओले गिराती रह गई। बाजुओं की शक्ति से कमजोर की कुछ मदद करने की चाहत खो […]
आग जलने दो यारों, धुआं ना करो दिल के जख्मों को गहरा कुआं ना करो मर ही जाने दो मुझको तुम्हें है कसम मेरे जीने की रब से दुआ ना करो शक्ति त्रिपाठी देव
आम खाके गुठलियों का ढेर लगाना है मेरी नहीं फ़ितरत। एक गुठली से बृक्ष लगाना, चाह मेरी और मेरी यही फितरत।।
तुम्हारे प्यार में मैं क्या से क्या हो गया, कभी मिट्टी का दीया कभी मटका बन गया, जब देखा तुम्हारो हाथों में गैर का हाथ। मैं फौलादी मिट्टी का इंसान टूट कर बिखर गया।। महेश […]
आतंकी गुंडे मवालियों का जात धर्म नहीं होता, सपनों में भी हत्यारो से अच्छा कर्म नहीं होता। गुंडे बदमाश के लिए आलाप कढ़ाने वाले आस्तीन, जाहिलो के लिए दिल में कोई मर्म नहीं होता।।
इस कदर प्यार में डूबा कि फिर उबर ना सका, पसंद बहुत आया पर दिल में उतर ना सका।
आज सोंचा कि थोड़ा मुकम्मल हो लूँ जहान को अपने खुशियों से रोशन कर लूँ।
क्या अपराधी मार देने से इन्साफ हो गया। आज क्या शह देने वालों का पर्दाफ़ाश हो गया।
मर गया आज एक और रावण मगर रामराज़्य की कोई उम्मीद नहीं जब शह देने वाले जीवित हैं तो गुंडाराज खत्म होने की कोई उम्मीद नहीं।
संवेदनाएं मर चुकी हैं आज सब किस तरह कविता कहूं तुम ही कहो सब दिखावा है मेरे व्यवहार में किस तरह कविता कहूं तुम ही कहो. डॉ. सतीश पांडेय, चम्पावत उत्तराखंड
मानों कल हि की बात हो…… एक नन्ही सी गुड़िया, मेरे गुड्डे से ब्याही थी। दुल्हन के लिबास में, आंगन में खिलखिलाई थी। मुस्कुराहट पर उसकी, दुनिया सारी वार दू्ं। दुआओं-आशिर्वाद संग, उम्र भर का […]
मां के आंगन को, पकवानों की खुशबू से महकाती है। कभी बहन बनकर, कभी दोस्त बनकर, रास्ता दिखाती हैं। ख़ामोश मुस्कुराहट से ही, सब-कुछ कहजाति है। पर कभी – कभी तो, बड़ी-बड़ी आंखों से हमें […]
फिर शान से लहराया तिरंगा, देखो आज अपने देश में। बड़ा सुहावन लगे जन गण मन गीत, आज अपने देश मे।। कहीं इंक़िलाब जिंदाबाद तो कहीं जय जवान जय किसान। यही नारे से प्रेरित हो […]
देखी दुनिया सारी फिर भी रहे अनाड़ी कर कुछ भी न पाए वो बनते रहे खिलाडी
अम्मा, एक बात कहूं ये जो तुम बकरी भैस गोबर घास में लगी रहती हो न अच्छा है, तुम अकेली तो नही बाबू की अलग सुनने की आदत, तुम्हारी थकान, तुम जो आकर शाम को […]
हज़ारों सवालों से भरी ये ज़िन्दगी कभी खुद के वजूद पर सवाल उठाती कभीचलती भी,कभी दौड़ती भी है ये थक कर कभी चूर चूर हो जाती हर दिन नए हौसलों को संग लेकर शाम ढलते […]
कैसे समझाएं तुम्हें कि हम कोई झुंड नहीं है मवेशियों के कैसे यकीन दिलाएं तुम्हें कि हमारे भी कई ख्वाब हैं छोटी-छोटी ख्वाहिशें हैं जिन्हें हम भूल नहीं सकते तुम हमारे जीवन में आते हो […]
धरती जल रही अम्बर जल रहा जल रहा सकल जहान । हाल कहे क्या पशु-पक्षियों के हैं व्याकुल सब इन्सान ।। सघन छाँव करके मैं तरूवर सबको पास बुलाया । खुद जलकर सूरज किरणों से […]
सुनाती नहीं मैं अपना गम किसी को तो खुशियों का इजहार करूँ कैसे, मुश्किले है मेरी राह में बहुत मैं अपनी मंजिल पर आगे बढूँ तो बढूँ कैसे?
वतन फ़रामोश तेरा अंतिम घड़ी एक दिन आएगा। तेरी चौड़ी छाती पे देखना, हमारा तिरंगा फहराएगा।। बहुत सह लिए तेरा जुर्म एक दिन फैसला हो जाएगा। सुभाष भगत आज़ाद की दास्तान मेरा पंजा बताएगा।। फौलादी […]
भ्रूण हत्या पाप है तू पाप का भागी न बन बाप है बेटी बचा ले बधिक अपराधी न बन – डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड।
रुह जब लहू होकर रोती है मौत से जिंदगी जब रूबरू होती है लौट आते है सारे मंजर नजर में मेरी जब जिंदगी मौत सी हूबहू होती है
रिश्ता तो एक ही है तुमारा और मेरा उनसे तुमारे पास जमीन है ना! और वो उसी का भाव जानते है। ~ राजू पाण्डेय
भीड़ है बहुत दिखता तन्हा हर इंसान हैं एक दूजे से मुँह फुलाये खड़े मकान हैं सूरज को भी जगह नहीं झांक पाने की फुर्सत किसे, दूजे की देली लांघ जाने की फिर भी पड़ोसी […]
दीवारों के भी कान होते है, लोग कहते हैं लेकिन मेरी चीखें क्यों सुन नहीं पाता है मेरा खामोश घर
हम वो वीर है जो मरने से कभी डरे ही नहीं। सिन्हे पे गोली खा के भी सिर झुकाए ही नहीं।।
सुनाती नहीं मै अपना गम किसी को तो अपनी खुशियों का इजहार करूँ कैसे ? मुश्किलें है बहुत रास्ते में मेरे मैं अपनी मंजिल पर आगे बढूँ तो बढूँ कैसे?
सच कभी हमारा दामन नहीं छोड़ता कोई भटकाव हमारा प्रण नहीं तोड़ता जब भी विरोधाभास का आभास हुआ हम कोई प्रतिक्रिया देते वक़्त नहीं भूले अपने शब्दों को बोलने से पहले तोलना फिर भी जाने […]
आने से पहले ही गैर जीवन का पुरौधा बन गया जन्म से पहले ही जननी की कोख का सौदा हो गया अंश किसी का,गर्भ किसी का ,किसी और गर्भ में प्रत्यारोपित लोग कौन ,देश कौन […]
बिना पत्तों की टहनियां कहां छांव देती हैं जिंदगी से जब ज्यादा मांगो तो हमेशा घाव देती है
कितनी अजीब है दुनिया कितने अजीब है लोगों के काम बटोर रहे हैं दोनों हाथों से जाने को कर खाली झोली तमाम
पैर जैसे ही पड़े आंगन में बरसों बाद एक एक पाथर मचल उठा, सुबक पड़ा उसके आने के अहसास से ये तो वही पैर थे जो बरसों पहले बच्पन में दिनभर धमाचौकड़ी करते थे आंगन […]
आज टूट गये हम तुम्हारे वादों की तरह बरस गयी आंखे हमारी बावरे सावन की तरह
चारो तरफ कयामत ही कयामत है। जिधर देखो करोना के ही क़हर है।। महामारी में जी रहे है हम और आप। फिर भी उम्मीद के किरण जलाए बैठे है।। आज नहीं तो कल होंगे कामयाब […]
जिस महफ़िल में कोई जानता ना हो, उस महफ़िल में जाना क्यूं है जिस महफ़िल में,अनसुना कर दें तुझे उस महफ़िल में, कुछ सुनाना क्यूं है मुखौटे लगा कर बैठे हैं लोग जहां, वहां तुझे […]
हम भी टूटे थे जब तुम्हारे वादे झूठे थे हम रोते थे जब तुम किसी और के साथ हस्ते थे आज हम खुद को मनाना सिख लिए बस तूम्हारी परवाह छोड़ दिये
रंग-बिरंगे नज़ारे हैं बेहिसाब.. खो न जाना इन नज़ारो में.. ज़रा सम्भलना, यह दुनिया हैं जनाब। साथ बैठ के खाते जिस संग, वहीं दगा कर जाते हैं और बड़ी-बड़ी बातें करते बेहिसाब, ज़रा सम्भल कर […]
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