चल साथी चल करें हम नये युग का सूत्रपात बढ़ चलें नवीन पथ पर हाथों में लेकर हाथ ना जाति-पांति के बंधन हों ना मरी हुई संवेदनाएँ ना लाशों के ढेर लगे हों ना आगे […]
चल साथी चल करें हम नये युग का सूत्रपात बढ़ चलें नवीन पथ पर हाथों में लेकर हाथ ना जाति-पांति के बंधन हों ना मरी हुई संवेदनाएँ ना लाशों के ढेर लगे हों ना आगे […]
विविधता में एकता के सूत्र को सहजता से पिङोती जो संस्कृत की बेटी, विविध भाषाओं की सहचरी है वो। माँ सी ममता जिसके हर वर्ण में समाहित है फिरन्गी भी जिसे सीखने को ललायित हैं […]
मेरा जिससे था प्रेम प्रसंग वो रहता था हर पल मेरे संग हम एक दूजे के साये थे जन्मों बाद करीब आए थे.. वो हाथों में हाथ लिए बैठा था बोला मुझसे विवाह रचा लो […]
15अगस्त 1947 की रात को भारत देश नहीं, भारत के लोग आजाद हुए थे। देश और देशवासियों को कुछ भी कहने और कुछ भी करने के लिए, साथ ही आजाद हुए सिर्फ अपने भले के […]
वो रात भर खांसती! चिल्लाती! घबराती! फड़फड़ाती! भुखी-प्यासी, आंसू बहाती, अकेली तड़पती, चलीं गईं! छोड़ सांस , वो चली गई। मगर बेटे बड़े संस्कारी! ऐसे ना भुखा जाने देंगे, जीते जी तो कुछ कर ना […]
सीता वियोग में बहुत विकल थे प्रज्ञा के श्रीराम ! एकाएक याद हो आई सिय से प्रथम मिलन की बेला !! ज्यों घोर तिमिर में कौंध उठी हो अकस्मात दामिनी त्यों राम हृदय में जगमगा […]
बहुत झगड़े हम रात भर दिल से अपने , मगर बदनामी करे, मनमानी करे, दिल मेरा , तुम्हारी ही गुलामी करें , आखिर आना ही पड़ा लौटकर , तेरे शहर में, तेरी गलियों में, हसरत […]
मैं लिखती हूं कुछ अलग-सा, मुझे इंसानों से ,न नफ़रत हैं, बस करती, निंदा बुराइयों की, दुःख देने की , न हसरत है।
चाय के कप से उठते धुंए में, तेरी शकल नज़ार आती है, ऐसे खो जाते है तेरे ख्यालों में, की अक्सर मेरी चाय ठंडी हो जाती है। Read Also : Good Morning Shayari
यह न समझो हम बहुत दिल के बुरे हैं बस जरा अनदेखियों से बुझ गए हैं, लक्ष्य के थे पास लेकिन गिर गए थे फिर उसे पाने में पूरे खप गये हैं। इसलिए थोड़ा समय […]
सब कहते हैं! ज़माना बुरा है, मगर ज़माना बना तो हम से ही है, हम ढुंढते है खामियां औरों में, क्या सारी अच्छाईयां हम में ही है!
यदि कभी तुम प्यार की बिल्डिंग बनाओ तो मुझे अस्ल पर रख देना तब इत्माम पाओगे। क्योंकि मैं ही हूँ वो जो अधिकारिणी हूँ प्यार की त्याग कर मुझको कई इल्जाम पाओगे।
सोची समझी चाल से, शायद जानबूझकर पार्टियां वे कर रहे, विश्व को मौत में ढकेल कर। जिस वुहान से इसकी शुरुआत हुई इससे निजात की, तैयारी थी क्या कर रखी। मास्क को दे तिलांजली, दुनिया […]
खलिश जितनी भी है सारी उड़ेलूं सोचता है मन, मगर प्रसन्नता की राह तो यह भी नहीं पक्की। चलो छोड़ो भी जाने दो न आये नींद आंखों में मगर कुछ चैन पाने को जरूरी है […]
पाबंदियों की धज्जियां उङाते, सीधे-सीधे संक्रमण को आमंत्रण देने निकल पङे । गजब की परिस्थितिया, चारों तरफ मंडराते मौत के बीच खुद को चुनौती देने निकल पङे । संकटकालीन दौर में जीते, मन बेचैन जिगर […]
जो भी लिखता हूँ कविता आप इश्रत ही समझना, न मुझसे, न खुद से बस खुदा से तिश्रगी रखना। जब कभी मित्र बनकर बैठना चाहोगे तो मैं भी बिठाउँगा खुशी से आपको दिल के बियाँबा […]
अक्सर मैं भूल जाती हूं , अपनी राह। ख्वाब अनेकों हैं, अब खत्म है चाह। कभी उम्र की सीमा रोक देती है, कभी दूसरों की सलाह। पर भुला कर बढ़ती हूं आगे, फिर से उठते […]
चलो विदा करते हैं उन यादों को, कब तक कैद रखे ! उन्हें यादों के पिटारों में।
आज भी आंखें सिर्फ उम्मीद के रंग ही तलाशती है, क्या रंग नहीं देखे! इन आंखों से पूछो।
अभी भी उम्मीद बाकी है, अभी मेरी सांसों में सांस बाकी है। कुछ छूने की ऊंचाईयां, कुछ पाने की इच्छा अभी मेरे सपनों में जान बाकी है।
लगता था जिंदगी बहुत बेमानी हो गई पहले-पहल ऐसे लगा कुछ छूट रहा यह जग सारा टूट रहा फिर कुछ दिन बीते मन शांत होने लगा छूटने का गम नहीं कुछ पाने की चाह हुई […]
सुनो ए दोस्त तुम ए काम न किया करो। मुहब्बत को यों बदनाम न किया करो।। माना कि रास्ते बहुत कठिन है इश्क के। फिर भी अपनी इश्क़ पे यकीन किया करो।। जो हर मर्तबा […]
टूट कर चारों तरफ बिखरा हुआ हूँ दोस्तो। काँच सा तीखा, दिलों में, चुभ रहा हूँ दोस्तो। फर्क इतना है कि मैं टूटा नहीं हूं खुद ब खुद। मार कर पत्थर बड़े, रौंधा गया हूँ […]
तुम्हारे अंजुमन में जब कभी दो शब्द बोलूंगा, हिला दूँगा मैं भीतर तक सामने सत्य ला दूँगा। नहीं चिंता मुझे है अब कि मैं बदनाम होऊँगा कर दिया खत्म सब तुमने कहाँ अब नाम पाऊँगा।
पढ़ लेते हैं पन्ने जिंदगी के, जब हंसना हो या रोना हो। अब भी उसी तरह दिखते हैं , वो बदलते ही नहीं , बीते वक्त के बाद भी।
आजाद किसे कहें? सब बंधे हैं बंधन में। हर शाम पंछी, अपना घोंसला तलाशता है। जहां चाह होती है, अपने आशियाने की। वह बोलते नहीं तो क्या, दिख जाती है उनकी ममता, जब चुग कर […]
कितनी जाजिब हो तुम कितना मीठा कहती हो, सबको खुश रखने को सब कुछ खुद पर सहती हो। परिवार बनाने वाली हो प्यार लुटाने वाली हो खुद तो सब कुछ हो मेरा मुझको सब कुछ […]
कविता – तेरी खता ————————- तेरी खता फिर से तुझे, बदनाम कर सकती| तेरे लफ्जों के कारण ही, तुझे शैतान कह सकती| कहां अगर तू ये सच्चाई, तुझे बदनाम करते हैं| करें सबसे शिकायत जो […]
हमारी और उनकी एक सी बात कहां, वो हैं सच के पुजारी झूठ की बोरियां हम। रात सोती है दुनियां जागते खामखां हम दिल्लगी कर न पाए बन गए बेवफा हम। शक उठा आज मन […]
एक सवाल पूंछना है तुमसे एक बार आकर तो मिलो सब कुछ तो ठीक हो गया है तुम्हारे जाने के बाद… पर नींद कहाँ गुम हो गई यही पूंछना है मुझे रातें चाँद, तारे देखकर […]
तू शक्तिशाली!,मैं दलित ! तू स्वर्ण ! मैं नीच! यह शब्द स्वार्थ में , तूने ही मुझे दिए। तू मालिक, मैं दास, तेरी विचारधारा में; मेरा उपहास, शोषण का खाता, यहां हर रोज खुलता है, […]
आंगन में एक पाटा रखकर पण्डित और परिचितों को बुलाकर लगा तैयारी में पूरा घर पकवान और मिष्ठान बनाकर हाथ जोड़कर सब बैठे हैं दादी की बरसी है आज एक बरस होने को आया पर […]
नन्ना-सा ,एक छोटा-सा , टहनी बड़ी, मगर कोमल-सा, अकेला मनोहर पौधा, तेज हवाओं में ,वो झूला झूले, कभी इधर कभी उधर, क्रीडा ललाम बड़ी सुहावनी, बारिश में वो नृत्य करें, मगर माली ठहरा क्रुर-सा, पौधा […]
‘वो जिसे तूने था पल भर में तार-तार किया, कभी तो पूछ अब वो ऐतबार कैसा है.. छोड़, जाने दे, आज तेरी बात करते हैं, वो तेरे दिल में जो रहता था प्यार कैसा है..’ […]
हमें प्यार की बीमारी हो गई, याद में उसके शरीर जर्जर हो गई| अब हमें चार कंधों की जरूरत नहीं, शमशान एक व्यक्ति ले जाए ऐसी मेरी शरीर हो गई| वर्ष पहले नींद छूट गई […]
सावन की बहार है कविताओं की बौछार है। कवियों और कवयत्रियों का पावन ये परिवार है।।
जहाँ मुस्कुराहटों की दौर है। अन्यत्र कहाँ अपना ठौर है।।
नव – प्रभात है बीती निशा , जागो कोई कर रहा प्रतीक्षा । धूप खिली है, सब पंछी भी उठ गए, अब रैन कहां जो सोए हो।
मुझको संभाल कर वो खुद गिर गए। ऐसा साथी सब को कहाँ मिल पाए।।
सावन पर कविताओं की बहार छाई है मेरी कविता अभी तो ना तैयार होके आई है। कहती है थोड़ा और बन संवर लूं … अच्छी सी दिखूंगी थोड़ा और निखर लूं । सब को लिखते […]
आज वे इस तरह से मुस्काये कि उलझे रह गए हम मुस्कुराहट में जो असली बात थी कहनी उसे कह नहीं पाए।
बहुत संभाल कर रखे हैं, कुछ रिश्ते मैंने। उनसे रूबरू भी होते हैं। कभी हंस कर निभाते हैं, तो कभी हंसा कर निभाते हैं।
हम हौसलों के पंख भी लगा लेते अगर उड़ने की चाह होती……
प्यार करता हूँ कविता से भले ही हथकड़ी डालो, लिखूंगा स्वेद से अपने गलफहमी नहीं पालो।
मुहब्ब्त ने हमें इस कदर आसिम बना के छोड़ा है, हर कोई मारकर पत्थर अजाब देता है।
होंठों की मुस्कान है बेटी सबके घर की शान है बेटी बेटा तो है कुल का दीपक दो कुल का अभिमान है बेटी..
मैंने कोई मौसम नहीं देखा ! मैंने तुम्हें चाहा है चाय की तरह !!
बेखुदी में जो उठ गये थे कदम तेरी बेवफाई याद आते ही खुद-ब-खुद रूक गये…
वो आज भी मुझे बेतहाशा मोहब्बत करता है, यकीन नहीं है मगर दिल को यही लगता है..
किसी अदीब को हम हस्तरेखाएं दिखाकर पूछना चाहेंगे, क्यों की प्यार ने यूँ बेवफाई।
Please confirm you want to block this member.
You will no longer be able to:
Please note: This action will also remove this member from your connections and send a report to the site admin. Please allow a few minutes for this process to complete.