पाकीज़गी अब दिखती नहीं , इन आबो-हवा में भी । कभी दम घुटता है तो, कभी मन । कभी सास भी बेपरवाह हो जाती है , हां, यह रुख भी बदला है , अब सुकून […]

रची जाती यहां, प्यारी-प्यारी रचनाऐं मन के भावों को दर्शाती सामाजिक मुद्दों पर जागरूक कराती संस्कृति का दर्शन करवाती मन को आनंदित कर जाती रचनाओं उपरांत, समीक्षा पढ़ने की बारी आती जिसमे समीक्षकों की भिन्न […]

कितनी पी लेते हो जो होश नहीं रहता है जमाना तुम्हें शराबी कहके हँसता है… इतना धुत हो जाते हो कि कुछ भी याद नहीं रहता है! किसे क्या कहते हो कुछ होश तुम्हें रहता […]

हाल ही में प्रज्ञा जी की कविता ‘वनिता’ को प्रेस में काफ़ी सराहना मिली। सावन परिवार प्रज्ञा जी के लिये कामना करता है कि उनको काव्य की दुनिया में हर दिन नई ऊंचाई और दिशा […]

दिन रात घर घर की यही कहानी है। सास बहू के झगड़े युग युगांतर पुरानी है।। सास की कड़वी – बोली मैं तुमसे कम नहीं कलमुंही। बहू की कड़वी जबाब – तू ही जहर की […]

बड़े शहर की जिंदगी को छोड़ , अब छोटे शहर की जिंदगी को, जीकर देख रहे हैं यहां भी लोग हैं; वहां भी लोग थे, यहां सोच बड़ी, वहां सोच छोटी , न निभाते हैं […]

बिट्टू लेता था आंखे मींचे, मैंने सोचा सोया है वो। मैंने एक सखी को फ़ोन लगाया, सुबह पति से हुई लड़ाई का सारा वृतांत सुनाया । फोन रख के जब मैं पलटी, बिट्टू मुझको घूर […]

मैं पीङ तेरी अपनाना चाहती हूँ तेरे आँसूओ की वज़ह जानना चाहती हूँ ।। तेरी साधना, तपस्या, त्याग के भाव को बस अपने में समाना चाहती हूँ ।। तेरी करूणा वात्सल्य ममत्व के गुणों को […]

किसी की रूसवायी की वज़ह क्यूँ बनें ऐ मेरी जिंदगी, चलो हम ही चले जाते हैं । औरों की परेशानी का सबब क्यूँ बने किसी की आँखों की चुभन क्यूँ बने तेरा चैन यूँ ही […]

बात 4-5 साल पहले की है। मेरे छोटे भाई ने एक लड़की पसंद कर ली। लड़की विजातीय थी, बस घर में कोहराम मच गया। जो चाचा,मामा फूफा मेरे भाई पर लाड लुटाते थे, मानो उसके […]

गीत, गज़लें लिख रही हूँ कुछ अलग ही दिख रही हूँ होंठों पर हैं लफ्ज अटके मन ही मन में पिस रही हूँ आ गई अब शाम, दिन की दोपहर ही लग रही हूँ गुनगुनी-सी […]

पाकर सब नदियों का पानी सागर को खूब मचलते देखा। पत्थर के कलेजे रखनेवाले हिमालय को पिघलते देखा।। गम्भीर बड़ा आकाश मगर हमने उसको भी रोते देखा। सबको पाक करे जो नदियाँ बीच कीचड़ में […]

नारी हो निराशा नहीं, टूटे ना तेरी आशा कहीं,। निशा है तो नव – प्रभात भी आएगा । तेरी जीत का परचम लहरएगा । खोखले, ढकोसले, न तुझे रुलाएं, खुदी को कर बुलंद इतना, कि […]

हमें आता जाता कुछ भी नहीं, सिर्फ शब्दों में खेल रहा हूं| परिणाम का हमें कुछ पता नहीं, मीठा खट्टा बोल रहा हूं| शब्द आन मान शान हैं, शब्द शब्द वेदी बाण है| शब्द राजाओं […]

अपने भाई दूज की तुमको खिला मिठाई आँखों में थी हया ग्लास पानी का लाई… तुम तिरछी नज़रों से मुझको यूँ देख रहे थे मन ही मन में कितने लड्डू फूट रहे थे… ना तुम […]

अध्य्यन-अध्यापन का बढ़ता व्यवसायीकरण राष्ट्र के पतन व जनता के घुटन का है कारण अत्याचार कोई जब हद से अधिक बढ़ जाता है प्रकृति तब बचने का कोई अवसर दिखाता है शिक्षा जन जन की […]

जूम गूगल मीट पे क्लास चल रही है | नेटवर्क भी सही नहीं, फिर भी बात हो रही है| मोर मोरनी बिछड़ गए, राधा बन घर रो रही| है गरीबी की मार से, खुद फोन […]

आओ थाली बजाते हैं! गरीबी का मुंह दिखाने वाली, बेरोजगारी के लिए , आओ ताली बजाते हैं! देश की कमर तोड़ने वाली मरी हुई अर्थव्यवस्था के लिए, आओ थाली बजाते हैं! झूठ को सच बनाने […]

तुम नारी हो, यूं अबला न बनो । दुर्गा – अवतारी हो, सबला तो बनो । बीती बातों को छोड़ परे, आगे के रस्ते तय तो करो । रस्ता था, कांटो वाला बीत गया रस्ता […]

वक्त अनमोल है, ना कोई इसका मोल है । मुफ़्त में मिले, कुदरत से, इसकी कीमत पहचान । गर तू करेगा वक्त की कद्र……. तो वक्त भी तेरी कद्र करेगा ऐ इन्सान । जीवन जी […]

शोर भीतर भी है। शोर बाहर भी है । ये ऐसा मंथन हैं। जो चलता रहता है। गुंजता रहता है। हम शांत नहीं कर पाते। बस बना लेते हैं। शोर को अपनी आदत का हिस्सा।

बहुत दिनों के बाद , जब खोला मैंने यादों का पिटारा । कुछ बचपन की किलकारियां गूंजी, कुछ मां की मीठी लोरी, कुछ पापा की डांट मिली। कुछ दिखे खेल पुराने जो खेलें अपनों संग, […]

तुमने रुला दिया मन जाने की बात कहकर, क्यों बोलते हो ऐसा कह दो ना आज खुलकर। अब तो हमारे मन में स्थान बन चुके हो, छोड़ा ना बीती बातें बैठो ना अपने बनकर।

जब तक तेरे कदम तल मंजिल शिखर न चूमें थकना नहीं है राही चलते ही रहना तब तक। टकरा ले पर्वतों से तू शक्तिपुंज बनकर, अपनी जगह बना ले अपनी भुजा के बल पर।

तूफ़ान तो नहीं हूँ लेकिन पवन हूँ चंचल तेरे आसपास चलकर शीतल करूंगा पल-पल। संगीतमय करूंगा कविता से तेरा आँचल उन्मुक्त खुशियाँ दूंगा तोडूंगा गम के सांकल।

ऐ जिन्दगी ! कभी तो तू मेरी होती जिधर को मैं कहती, उधर रूख़ करती ।। तू जिधर इशारा करती, मुङ जाते हैं उधर तेरे आगे अपनी मर्जी चलती है किधर काश! बस एक बार […]

इस बार की दुर्गा पूजा फीकी सी होंगी ना भव्य पंडाल होंगे ना भीड़ ना खाने के स्टाल्स होंगे ना पुलिस की बार्रिकडिंग इस बार की दशहरा फीकी सी होंगी रावण तोह बनेंगे पर भीड़ […]